ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू ,इंसानियत का पैगाम देना
तेरे हर अंश में जहां बहता था इंसानियत का खून
तो क्यों तूने उसमें फरेब,बेईमान और गद्दारी का अंश है मिलाया।
ए मेरे मुल्कवासियों...
क्यों भूल गया तू नैतिकता का पाठ पढ़ना
तेरे हर दीदार में जहां बसता था नैतिकता का आलम
तो क्यों तूने उसमे असभ्यता को पनपने दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों...
तू क्यों भूल गया अच्छाइयों का संगम
तेरे नियत में जहाँ अच्छाई बसती थी
तो तूने क्यों उसमें बुराई के जंजाल को आमंत्रण दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू देश प्रेम की भावना
तेरे हर सांस में जहाँ देश प्रेम का था बसेरा...
तो क्यों तूने इसमें देशद्रोही जैसे अपशब्दों को है बसाया ।
ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू शिक्षित होने का वादा
तेरे हर कण में जहां बहता था शिक्षा का अमृत रस....
तो क्यों तूने इसमें बाजारवाद जैसे विष को पनपने दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू ज्ञान का दीप जलाना
तेरे चारो ओर जहां जलता था ज्ञान का दीप
तो तूने क्यों उसे पेशा बनाकर बुझा दिया।
क्यों भूल गया तू ,इंसानियत का पैगाम देना
तेरे हर अंश में जहां बहता था इंसानियत का खून
तो क्यों तूने उसमें फरेब,बेईमान और गद्दारी का अंश है मिलाया।
ए मेरे मुल्कवासियों...
क्यों भूल गया तू नैतिकता का पाठ पढ़ना
तेरे हर दीदार में जहां बसता था नैतिकता का आलम
तो क्यों तूने उसमे असभ्यता को पनपने दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों...
तू क्यों भूल गया अच्छाइयों का संगम
तेरे नियत में जहाँ अच्छाई बसती थी
तो तूने क्यों उसमें बुराई के जंजाल को आमंत्रण दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू देश प्रेम की भावना
तेरे हर सांस में जहाँ देश प्रेम का था बसेरा...
तो क्यों तूने इसमें देशद्रोही जैसे अपशब्दों को है बसाया ।
ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू शिक्षित होने का वादा
तेरे हर कण में जहां बहता था शिक्षा का अमृत रस....
तो क्यों तूने इसमें बाजारवाद जैसे विष को पनपने दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू ज्ञान का दीप जलाना
तेरे चारो ओर जहां जलता था ज्ञान का दीप
तो तूने क्यों उसे पेशा बनाकर बुझा दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों....
क्यों भूल गया तू साधना और भक्ति को
तेरे कण कण में जहा बसता था भक्ति का संगम
तो क्यों तूने उसमे अन्धविश्वास का संगम घोला।
ए मेरे मुल्कवासियों....
तू क्यों भूल गया ईमानदारी का जीवन
तेरे नस नस में जहां ईमानदारी का ब्लड दौड़ता था...
तो तूने क्यों उसमें भ्र्ष्टाचार को दस्तक देने दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों....
अब समय आ गया है जाग जाओ,
इस मुल्क को बचा लो
वरना ए भ्रष्ट नेता बेच देंगे देश को,
कॉर्पोरेट के हाथ।
क्यों भूल गया तू साधना और भक्ति को
तेरे कण कण में जहा बसता था भक्ति का संगम
तो क्यों तूने उसमे अन्धविश्वास का संगम घोला।
ए मेरे मुल्कवासियों....
तू क्यों भूल गया ईमानदारी का जीवन
तेरे नस नस में जहां ईमानदारी का ब्लड दौड़ता था...
तो तूने क्यों उसमें भ्र्ष्टाचार को दस्तक देने दिया।
ए मेरे मुल्कवासियों....
अब समय आ गया है जाग जाओ,
इस मुल्क को बचा लो
वरना ए भ्रष्ट नेता बेच देंगे देश को,
कॉर्पोरेट के हाथ।
