आज फिर मंच सजा है। लंबे-लंबे व्याख्यान हो रहे है, बड़ी-बड़ी बातें हो रही है,महिला सशक्तिकरण की। योजनाओं की घोषणाएं हो रही है, तालियां बज रही है,मीडिया कवर कर रही है- ये सब देख रही है शारदा
(गांव की रहने वाली शारदा ये सब देखकर बहुत ही दुविधा में पड़ गयी और सोचने लग गई कि क्या वाकई आज की महिला आजाद है, मैं भी पापा को जाकर बोलती हूँ कि मुझे स्कूल जाना है।)
शारदा दौड़ी-दौड़ी गई और पापा से बोली कि 'आज महिला दिवस है।
पापा ने कहा 'हाँ'
शारदा ने मासूमियत भरी आवाज में कहा कि पापा वो शहर के कुछ बड़े-बड़े लोग आये है, महिलाओं की आजादी की बात कर रहे है और कह रहे है कि आज की महिला अपने फैसले लेने के लिए आजाद है। ये सुनकर पापा बोले कि बिटिया वो अपने मतलब की बात नहीं है, तू जाकर अपना काम कर। शारदा बोली 'पापा मुझे भी स्कूल जाना है, भाई के जैसे पढ़कर आपका नाम रोशन करना है।' शारदा की बात सुनकर पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और बोले कि 'चुपकर छोरी ये क्या बोल रही है तू,तेरा दिमाग घास चरने गया है क्या, छोरिया घर में ही अच्छी लगती है।'
(पापा की बात सुनकर शारदा रोने लगी और दौड़कर उसी जगह गई जहां मंच सजा है)
शारदा चिल्लाकर बोली 'बन्द कीजिये ये तमाशा बहुत हो गई आपकी बड़ी-बड़ी बातें, क्या फायदा आपके इन बातों का, जब आज भी मुझ जैसी हजारों लड़कियां स्कूल नहीं जा पाती है।'
(शारदा के सवालों का जवाब मंच पर मौजूद किसी के पास नहीं,सब मौन हो गए)
शारदा फिर बोली कि 'आप लोगों की तो आज बहुत तारीफे होगी, पुरस्कार मिलेंगे, खूब वाहवाही होगी, लेकिन क्या आप लोगों ने कभी जमीनी स्तर पर काम करने के बारे में सोचा है, नहीं सोचा न? अगर सोचते तो आज आप यहां मंच पर खड़े होकर भाषण देने के बजाय मुझ जैसी लड़कियों को स्कूल भेजने का काम करते।'
(शारदा की बहादुरी को देखकर लोगों ने जमकर तालियां बजाई)
शारदा की बात को सुनकर मंच से एक बुद्धजीवी बोले कि बेटा तू सही बोल रही है, आज हमें अपनी गलती का एहसास हुआ अब से हम जमीनी स्तर पर ही काम करेंगे और तुम जैसी लड़कियों को स्कूल तक पंहुचा कर ही रहेंगे।
(बुद्धजीवी की बात सुनकर तालियां बजने लगी)
शारदा के पापा ये सब देख रहे थे उन्होंने बोला कि 'मुझे माफ़ कर दो बेटी, आज से तुम स्कूल जाओगी'
शारदा बोली 'सच्ची पापा, मैं स्कूल जाऊंगी और पढूंगी?'
पापा-'हाँ बेटा'
शारदा पापा से बोली कि 'आज मैं तो स्कूल जा पाऊँगी, लेकिन अब भी कुछ लड़कियां है जो स्कूल नहीं जा पा रही है, अगर वो भी स्कूल जाने लगेंगी, तो सही मायने में महिला दिवस का उद्देश्य पूरा होगा।'
(शारदा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और वो हंसती-मुस्कुराती घर गई)