रविवार, 15 अक्टूबर 2017

बर्थडे स्पेशल: अखबार बेचते-बेचते कैसे बने भारत रत्न?

पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि देश के सर्वोच्च पुरस्कार से भी सम्मानित है। कलाम साहेब आज हमारे बीच में नहीं है, लेकिन फिर भी उनके होने का एहसास पूरे देश को है। 

15 अक्टूबर, 1931 को रामेश्वरम में जन्में कलाम तकदीर पर भरोसा न करके मेहनत पर भरोसा किया। यही कारण है कि आज कलाम देश के लिए प्रेरणा स्त्रोत है।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

जश्न-ए-दिवाली: साहेब हमारा क्या कसूर, जो सुनी कर दी दिवाली हमारी?

दिवाली को लेकर पूरे देश मे जश्न का माहौल हो गया है, लेकिन दिल्ली एनसीआर वालों के लिए ये दिवाली साइलेंट दिवाली हो सकती है! हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए इस साल दिल्ली एनसीआर में पटाखों पर बैन लगा दिया है!

 चलो ठीक है मान लिया जाए कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सही है! लेकिन सवाल उसके फैसले पर नहीं उठ रहे है बल्कि जिस समय ये फैसला लिया गया, वो वाकई कई लोगों के रोजी रोटी पर गहरा असर पड़ेगा! इतना ही नहीं करीब 200 करोड़ रुपये का भारी भरकम नुकसान भी हो सकता है!
 
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से पटाखा कारोबारियों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है! दिवाली के सीजन में पटाखों की बिक्री को देखते हुए कई ऐसे लोग भी होते हैं, जो दूर-दराज के क्षेत्रों से आकर दिल्ली में पटाखा बेचते है ताकि वो अपने बच्चों को दिवाली पर खुश कर सके! लेकिन अब क्या उनके बच्चों की दिवाली कैसे मनेगी? इन सवालों के बीच मे कई बड़े सवाल निकलते है, जिनमे से कुछ ऐसे है....

बड़े सवाल....
1.दिवाली के दस दिन पहले पटाखों पर बैन क्यों, अगर करना ही था तो एक महीने पहले होना चाहिए ताकि कोई भी विक्रेता पटाखा खरीदता ही नहीं!
2. अगर बैन लगाना ही था तो 1 नवम्बर तक ही क्यों, हमेशा के लिए क्यों नहीं?
3.प्रदूषण करने वाली हर चीज पर बैन कब? क्या अकेला पटाखों से ही प्रदूषण होता है? पान-गुटका-तम्बाकू-शराब आदि पर बैन कब? 
4.बैन करना ही था तो पूरे देश में क्यों नहीं? 
5. दिवाली से ठीक पहले पटाखों पर बैन लगाने से होने वाले नुकसान का भरपाई कौन करेगा? 
6.पटाखों से प्रदूषण होता है, इससे न तो कोर्ट अजनबी था और ना ही सरकार तो फिर क्यों सितंबर में लगने वाले बैन को हटा कर अब लगाया गया? 

आंकड़ों की बात करे तो दिल्ली-एनसीआर के पटाखा विक्रेताओं के पास लगभग 200 करोड़ का पटाखा फंस गया है। साथ ही आपको ये भी बता दूं कि नवभारत टाइम्स के वेबसाइट के अनुसार, दिल्ली में ही 50 से अधिक थोक और 300 से अधिक फुटकर पटाखा विक्रेता है। इसी तरह एनसीआर के शहरों में करीब 200 फुटकर पटाखा विक्रेता हैं।

इन्हीं तमाम सवालों से जूझ रहा है आज पटाखा बाजार। कई पटाखा विक्रेता तो ऐसे होते है, जो सिर्फ सीजनल मार्केटिंग करते है, ऐसे में ये उनके लिए किसी झटके से कम नहीं है! पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ पटाखों पर बैन लगाने की बात को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, पटाखा कारोबारियों ने याचिका दायर की थी लेकिन 13 अक्टूबर,2017 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि फैसले में किसी भी प्रकार का कोई संसोधन नहीं किया जाएगा! गौरतलब है कि दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर 1 नवम्बर तक बैन बरकरार रहेगा!
दिवाली के अगले दिन दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण का ग्राफ बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है, ऐसे में अगर पिछले साल की दिवाली की बात करे तो कई दिनों तक दिल्ली धुंधली -धुंधली ही थी, जिसकी वजह से दिल्ली निवासियों का सांस लेना भी मुश्किल हो गया था! यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए ये फैसला किया है! खैर, सुप्रीम कोर्ट का फैसला वाकई काबिले तारीफ है! लेकिन पटाखों पर बैन लगा है, तो जल्दी ही सुप्रीम कोर्ट को सरकारी दफ्तरों और गैर-सरकारी दफ्तरों में लगे वातानुकूलित को भी बैन करने पर विचार करना चाहिए क्योंकि वातानुकूलित से निकलने वाली गैस ओजोन को नुकसान पहुँचाती है!
खैर, मांजरा चाहे जो कुछ भी क्यों न हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को मजदूरों से उनकी रोजी रोटी नहीं छीननी चाहिए थी, बैन सही है, लेकिन बैन करने का समय बिल्कुल ही गलत है! आज दिल्ली एनसीआर के पटाखा विक्रेताओं का सवाल सुप्रीम कोर्ट से यही है कि आखिर क्या कसूर है उनका, जो उनकी दिवाली सुनी कर दी गयी? 

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

ये कैसा इंसाफ, न कातिल का पता न ही गुत्थी सुलझी?

आखिर क्या कसूर था आरुषि का, जिसकी वजह से उसे मौत के घाट उतारा गया था? कौन है आरुषि का कातिल? क्या कभी आरुषि के असली कातिल को कानून पकड़ पायेगा भी या नहीं? इन्हीं तमाम सवालों से आज भी जूझ रही होगी आरुषि की आत्मा!

 जी हाँ, 9 साल पहले, दिल्ली से सटे नोएडा में आरुषि का उसी के घर में बेदर्दी से हत्या कर दी गई थी! इस हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था!

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं...

राजनीति में आक्षेप-प्रतिआक्षेप बहुत सामान्य बात है. क्रिटिसिज़्म लोकतंत्र का मूल है, उसका आधातभूत गुण. वैसे तो बिना आलोचना के किसी भी क्षेत्र का निखार संभव ही नहीं जान पड़ता, पर बात यदि राजनीति की हो तो इसकी तो बुनियाद ही है.  असंतुष्टि और वैकल्पिकता !
 हर लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है. जो सरकार की नीतियों की सूक्ष्मातिसूक्ष्म और स्वस्थ आलोचना कर सके.

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: जहाँ चाह, राह वहाँ!

दीपकरोशनराधामनीष चलो बेटा चलोजल्दी करो। 'जी भैयाबस आये'। हर शाम तकरीबन बजे कुछ ऐसी ही आवाज गाजियाबाद जिले के प्रताप विहार कस्बे से आती सुनी जा सकती है। आप सोच रहे होंगे कि कहाँ चलने की बात हो रही है। जनाब ये तैयारी है जिंदगी में बहुत दूर तक जाने की।

 चलिए आपको विस्तार से समझाते हैं। ये आवाज हर शाम एक सामाजिक संस्था Light De Literacy’ के सदस्यों द्वारा लगाई जाती है।

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

विज्ञापन का नारीकरण या नारी का बाजारीकरण?

 विज्ञापनों की दुनिया जितनी ही खूबसूरत है, उतनी ही जटिल भी है। विज्ञापनों का इतिहास जितना रोचक है उतना ही उसे पनपने में कठिनाइयों का समाना करना पड़ा।

 वर्तमान युग में विज्ञापन के बिना बाजारवाद में उपनी साख जमाना किसी भी उत्पाद के लिए संभव नहीं है। उत्पादक अपने उत्पाद का प्रचार कैसे अर्थात किस माध्यम से और कहां करना है, इसकी रूपरेखा वो उत्पाद बनाने से पहले ही तय कर लेता है।

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: खबरें कहाँ है, आज खबर क्या है!

प्रश्न धड़ों में बंट चुके हैं, और जबाबदेही अय्याशियां कर रही है. देश बड़ा है. मुद्दे बड़े हैं. रोज एक सुबह होती है. रोज एक खबर आती है. पर देखने में आता है कि खबर खबर नहीं रहने पाती. उसके टुकड़े हो जाते हैं. विरोध, विरोध नहीं रह जाता. उसके रस्ते मुड़ जाते हैं.
 कभी किसी अति नीच अपराध के चलते अगर जनता अपनी दम पर कोई आंदोलन खड़ा भी करती है तो राजनैतिक दल उसका अधिग्रहण करने पहुँच जाते हैं.

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

एक अहिंसा का पुजारी तो दूसरा परमाणु अविष्कारक!

जरा सोचिये, वो कैसे नजारा होगा जब परमाणु अविष्कारक ने अहिंसा के पुजारी को पत्र लिखा था, ये तो वही बात हो गयी कि धरती और आसमान का एक हो जाना! अरे हैरान मत होइए, आप में से अधिकांश लोग तो शायद समझ ही गये होंगे कि मैं किसकी बात कर रही हूं? चलिये फिर भी आपको बताती हूँ!
जाने-माने वैज्ञानिक अलबर्ट आइंसटीन और महात्मा गांधी वैसे तो कभी एक दूसरे से मिले नहीं थे लेकिन दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान जरूर हुआ था! आसमान और धरती का मिलना जैसे असंभव है ठीक वैसे ही परमाणु के आविष्कारक और अहिंसा के पुजारी के बीच पत्राचार होना, थोड़ा तो खटक ही रहा है! 
1931 में अलबर्ट आइंसटीन ने गांधी जी के लिए पत्र लिखा! इस पत्र में आइंसटीन ने लिखा  था कि "अपने कारनामों से आपने बता दिया है कि हम अपने आदर्शों को हिंसा का सहारा लिए बिना भी हासिल कर सकते हैं! साथ ही हम हिंसावाद के समर्थकों को भी अहिंसक उपायों से जीत सकते हैं।

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: भाषा अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है!

अभिव्यक्ति के लिए भाषा का बहुत ज्यादा महत्व होता है। यह अभिव्यक्ति जनसामान्य की अस्मिता से लेकर देश के आगत भविष्य निर्माण के लिए भी हो सकती है। इसलिए भाषा का प्रश्न केवल भाषा तक ही सीमित नहीं होता है। यह यक्ष प्रश्न अंततः अपनी पहचान का प्रश्न है।


 आज भाषा की अभिव्यक्ति एवं पहचान दोनों ही प्रश्नों के घेरे में हैं। क्या जो हम सोचते हैं, उसे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाने में कितनी समर्थ हो रही है?

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

शास्त्री जयंती स्पेशल: सादगी और सच्चाई से ओतप्रोत, ऐसे थे भारत के दूसरे पीएम!

लाल बहादुर शास्त्री एक ऐसे व्यक्तिव है, जिनकी पहचान उनके नाम से बिल्कुल उलट है। जी हां, शास्त्री जी अपने नाम से बिल्कुल अलग-थलग है। उनके नाम यानी 'लाल' से आशय ये होता है कि गुस्से से लाल हो जाना, हमेशा क्रोधित होना, लेकिन शास्त्री जी ठीक इसके उलटे थे! सादगी और सच्चाई की मिसाल इस शख्स का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को यूपी के मुगलसराय में हुआ। शास्त्री जी के बारे में ढेर सारे अनकहे किस्से मौजूद है, जो शास्त्री जी के सादगी का उदाहरण देते है।
 
 कहा जाता है कि शास्त्री जी समय के पाबंद थे यानी घड़ी के सुइयों के अनुसार ही चलते थे!

गांधी जयंती स्पेशल: वो था बापू लाठी वाला....

 गांधी सिर्फ नाम ही नहीं है बल्कि शक्ति है! गांधी जी के शक्तियों का ही प्रभाव है कि आज भी पूरी दुनिया में उनका नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। जहाँ एक तरफ भारत में गांधी जी के जन्मदिन को गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है तो वहीं दूसरी तरफ सयुंक्त राष्ट्र संघ में 2007 से गांधी जयंती को 'विश्व अहिंसा दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

 गांधी जी के बारे में हम सभी सालों से पढ़ते या सुनते आ रहे हैं, लेकिन गांधी जी के बारे में जितना पढ़ो या सुनो उतना ही कम लगता है।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: साहब ये बहुत बड़ा धंधा है , इसे छोटा और आसान न समझो!

बार बार रास्ता निहारता हुआ और घड़ी की सुइयों को देखता हुआ मैं दोस्त के इंतजार में खड़ा था। कभी फोन करता तो कभी पसीना पोछता। शायद पहली बार ही ऐसा था कि मैं किसी मॉल के बाहर किसी का इंतजार कर रहा था, और करू ना भी तो क्यों? 

क्योंकि आखिरकार बहुत बातचीत करने के बाद मिलना तय हुआ था। अंदर से खुशी इतनी थी कि मैं बाहर ही इंतजार करने में आनंद लेने लगा था। कड़कड़ाती धूप से बचने के लिए मैं एक पेड़ की छांव में खड़ा हुआ था, तभी मेरी नजर, मुझसे दो कदम दूर बैठी एक महिला और उसके तीन बच्चों पर पड़ी।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

दशहरा स्पेशल: रावण तो जला रहे हैं, पर बुराइयों का नाश कब?

दशहरा यानी बुराई पर अच्छाई की जीत! इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। जगह-जगह रावण का पुतला जलाया जाता है। चलो अच्छा है, बुराई पर चलने वालों का हाल भी यही ही होना चाहिए! रावण के कर्मों की सजा तो श्रीराम दे ही चुके हैं, और रही सही कसर हम लोग हर साल पूरा ही करते हैं। यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या वाकई रावण को जला देने से ही आज हम बुराइयों पर जीत हासिल कर पा रहे हैं? क्या वाकई दशहरा के दिन हम अपने अंदर के तमाम बुराइयों के नाश कर देते हैं? अगर ऐसा है तो फिर क्यों आज समाज में इतनी बुराइयों ने अपना डेरा जमा रखा है? 
दशहरा पर हम रावण दहन इसलिये करते है क्योंकि हम खुद को याद दिलाते हैं कि बुराई का नाश होना तो तय ही है,

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: विकास की दुहाई, पर होए न 'विकास'

'विकास' एक बहुत ही पेंचीदा चीज़ है. ज़्यादा पढ़े-लिखे और डिग्रीधारी इसकी मनगढंत परिभाषा गढ़ते रहते हैं. और सत्ता से दूर व्यक्ति इसे मात्र छलावा मानते हैं. कुछ लोग इसे दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प से उपजी मानवनिर्मित कृति भी कहते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं. ये सब कोरी कल्पनायें मात्र हैं. दरअसल विकास एक निखालिस प्राकृतिक वस्तु है. एकदम परिस्थितियजन्य. कुकुरमुत्ते की भांति. और हमेशा कूड़े-करकट में ही पैदा होता है. 
इतिहास गवाह है कि जब जब देश में भूख और भीख जैसा घटियापन बढ़ा है; विकास उपजा है. उपजा क्या नाचा है. और ऐसा नाचा कि पल दो पल तो सारी क़ायनात विकासमय हो गई. चारों ओर विकास विकास हो लिया. सारी आवाज़े धूमिल हो गयीं. लोग बिलबिला गए.

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

बर्थडे स्पेशल: 'पैरों में बन्धन' से 'नैनो में सपना' लिये संगीत की दुनिया की महारथी!

 संगीत की दुनिया की मल्लिका जिन्होंने अपनी आवाज से सबको दीवाना बना दिया! लाजवाब आवाज, भारत रत्न से पुरस्कृत एक ऐसी संगीतकार जिसकी आवाज पर थिरके बड़े से बड़े कलाकार! जी हाँ, मैं बात कर रही हूं संगीत की दुनिया की महारथी लता मंगेशकर की।
 लता जी का जन्म 28 सितंबर, 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ! 13 साल की जब लता दी थी, तब इनके सर से पिता का हाथ उठा गया, लता जी ने संगीत की दुनिया में अपना नाम फेम बनाने के लिए बहुत ही संघर्ष किया, उनकी संघर्षो का ही नतीजा है कि आज उन्हें सुरों की मल्लिका के नाम से जाना जाता है।

बुधवार, 27 सितंबर 2017

जब महिलाएं ही स्वस्थ नहीं होंगी तो देश कैसे विकास करेगा?

 आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बुनियादी मुद्दे किसी कोने में दबते जा रहे हैं, और हमारे देश की मीडिया नेताओं और कलाकारों के पीछे भगाती रहती है। मीडिया इस पर ज्यादा ध्यान देता है कि आज किस पार्टी के नेता ने किस पार्टी के नेता पर तंज कसा है या फिर आज कौन सा कलाकार किस कलाकार के साथ डेट पर गया या फिर किसका ब्रेकअप हुआ! इन सबके के बीच मे बुनियादी मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं! बुनियादी मुद्दों से जुड़ा हुआ एक मामला ये भी है कि महिलाओं में कुपोषण का प्रभाव ज्यादा है। ऐसे में ढेर सारे सवाल खड़े होते हैं, जिनमें से एक ये है कि जब देश की महिलाएं ही स्वस्थ नहीं होंगी तो देश कैसे विकास करेगा ?


 देश के विकास में महिलाओं के योगदान से तो शायद ही कोई बेखबर होगा क्योंकि हम सभी जानते है कि देश का भविष्य बच्चे होते हैं,

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: युवाओं के लिए राष्ट्रीय कर्तव्य सर्वोपरि होना चाहिए

युवाओं का शौर्य, पराक्रम एवं साहस ही राष्ट्र की एकता, अखंडता व सुरक्षा का सर्वोत्तम आधार है। युवाओं के शौर्य एवं तेज़ के बिना राष्ट्रीय एकता, अखंडता की कल्पना करना संभव नही है; क्योंकि राष्ट्रीय एकता की कल्पना तो की जा सकती है, परंतु इसे क्रियान्वित करने के लिए युवाओं की ही आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए केवल वे ही युवा जिम्मेदार नहीं है, जो राष्ट्रीय सेवाओं में कार्यरत हैं, बल्कि वे भी हैं, जो देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग कार्यों में संलग्न हैं। जो जहां है, वहीं उनकी अपनी विशेष भूमिका है। देश का प्रत्येक युवा अपने ढंग से अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए कार्य करे तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।



           युवा अपने काम को ईमानदारी से करते हुए जनसेवा, राष्ट्रीय सौहार्द, भ्रष्टाचार, अनाचार, अनीति से संघर्ष जैसे कितने ही महत्वपूर्ण कार्य संपन्न कर सकते है।

सोमवार, 25 सितंबर 2017

धर्म नहीं, देश के नजरिये से देखो रोहिंग्या समुदाय को!

 रोहिंग्या समुदाय की चर्चा आज पूरे विश्व में हो रही है, हर कोई इन्हें दूसरे देश पर थोपना चाहता है, लेकिन कोई इन्हें अपनाना नहीं चाहता है। मसला इतना गरम हो गया है कि ये मुद्दा वैश्विक स्तर की चुनौती का रूप लेता नजर आ रहा है। खैर, मैं बात करूँगी कि आखिर रोहिंग्या को शरण हम क्यों नहीं दे सकते है? रोहिंग्या समुदाय पर मैं ज्यादा पीछे नहीं जाऊंगी, मैं सिर्फ उन कारणों पर बात करूँगी, जिसकी वजह से भारत चाहकर भी इस समुदाय को जगह नहीं दे सकता है, और अगर दे भी दिया तो समुदाय के साथ गद्दारी होगी क्योंकि वो हमारे यहां इस उम्मीद से आएंगे कि उनका जीवन खुशहाली से बीते। 



 भारत की सुरक्षा एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार रोहिंग्या समुदाय से देश को खतरा है।

रविवार, 24 सितंबर 2017

बीएचयूकांड: छेड़खानी, लाठी बरसाना ही तुम्हारी मर्दानगी है!

गजब का समाज है मेरा...नवरात्रि का जश्न मना रहे है, दुर्गा माँ को पूज रहे हैं, लेकिन देश की बहू-बेटियों की इज्जत सरेआम उछाल रहे है! वाह क्या समाज बनाया है हमने! अरे समाज के ठेकेदारों कहाँ छिपे बैठे हो, क्यों नहीं आते हो सामने अब? अच्छा हां, भूल गयी मैं! आप तो यही कहेंगे न कि क्या जरूरत थी उस लड़की को शाम को कैंपस में घूमने की या फिर और भी बहाने होंगे न आपके पास? गजब का रूल है आपका, अपने हिसाब से बना भी लेते हो और तोड़ भी देते हो!

 गली-मोहल्लों में तो बहु बेटियों के साथ छेड़खानी तो होती आयी है, लेकिन अब तो हद ही हो गयी कॉलेज कैंपस में छेड़खानी?

#युवा कलम-युवा आवाज: बीएचयू की छात्राओं का प्रदर्शन, कब मिलेगी सुरक्षा?

यूं ही तो नहीं कोई किसी से भिड़ जाता है. यूं ही तो नहीं कोई कहीं बैठ जाता है. तो क्या कारण रहा होगा कि BHU की छात्राओं को प्रदर्शन के लिए विवश होना पड़ा ? क्या कारण रहा होगा कि एन्टी रोमियो स्क्वाड अपने लक्षित उद्देश्य में असफल रहा ? जबकि उसका प्रचार तो बड़ी धूम-धाम से किया गया था. वो सत्ता पक्ष के गलियारों का बैनर भी था. चुनावी घोषणा पत्र से लेकर उपलब्धियों के आत्म-प्रशंसन तक उसे शीर्षस्थ रखा गया और आज हालात ये हैं कि छात्राओं को प्रदर्शन करना पड़ रहा है । 
 
कल जब प्रधानमंत्री मोदी अपने संसदीय क्षेत्र बनारस के दौरे पर निकलते हैं तो पाते हैं कि

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी दिवस स्पेशल!

 देश भर में हिन्दी दिवस बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। कई मंच सजे है, हिन्दी के शुभचिंतक हिन्दी दिवस के पावन मौके पर लंबे चौड़े भाषण दे रहे है। इन सबके बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि भाषण देने के बाद अधिकांश विशेषज्ञ हिंदी में बात भी करना पसंद नहीं करते है तो फिर क्यों वो हिन्दी दिवस पर भाषण देते है? खैर, भाषा कोई भी क्यों न हो, वो सम्मान के हकदार है! 


कुछ दिन पहले एक भाषा सिखाने वाले एक इंस्टीट्यूट के बाहर एक होडिंग देखा था मैंने उसमें बड़े ही आकर्षक भाव से ये लिखा था कि 'आइये इंग्लिश में बात करें'।

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

टीचर डे स्पेशल.....

अगर आप टीचर का मतलब सिर्फ स्कूल, कॉलेज या सिर्फ पाठ्यक्रम को खत्म कराने वाले को ही समझते है, तो माफ कीजिये आप गलत है! क्योंकि टीचर सिर्फ वो नहीं जो आपको किताबी ज्ञान दे, बल्कि टीचर तो वो होते है, जो आपको किताबी ज्ञान देने के साथ ही आपको सही दिशा दिखाए! इस कड़ी में वो टीचर आपका भाई, माता-पिता, दोस्त या फिर कोई भी हो सकता है! तो आइयें इस टीचर डे अपने लाइफ के असली टीचर को याद करें, जिसने वाकई आपकी लाइफ में रोशनी का काम किया हो!

क्यों मनाया जाता है टीचर डे....

टीचर डे क्यों मनाया जाता है, इससे आप सभी अच्छे से रूबरू होंगे, फिर भी आपको बताती हूँ!

सोमवार, 4 सितंबर 2017

मजदूरी वही, अंदाज नया!

भारत के इतिहास पर गौर किया जाए तो बंधुआ मजदूरी का लंबा-चौड़ा इतिहास देखने को मिलता है। प्राचीन समय मे जमीदार बंधुआ मजदूरी करवाते थे, और अब पूंजीपतियों द्वारा इसको नया रूप दे दिया है। जी हाँ, मैं आपका नये नाम से परिचय करवाती हूँ, ये नया नाम है- हिंदी में नौकरी और अंग्रेजी में जॉब! आप सभी इस नाम से भलीभांति परिचित ही हैं, इसलिए इसका विवरण करने की कोई जरूरत नहीं है! खैर ये फिजूल की बात छोड़कर मुद्दे की बात करते है!


हां तो मैं बात कर रही हूं मजदूरी की! बंधुआ मजदूरी को समझना है तो कलर्स पर 'उड़ान' नामक कार्यक्रम का संचालन होता है, उसके शुरू के एपिसोड देखेंगे तो आपको बंधुआ मजदूरी का अर्थ समझ आ जायेगा!

रविवार, 20 अगस्त 2017

'प्रभु' आपकी कृपा कब होगी?

एक के बाद रेल हादसों से यही सवाल खड़ा होता है कि आखिर कब होगी प्रभु की कृपा। जी हां, मैं बात कर रही हूं रेल मंत्री सुरेश प्रभु की, प्रभु जी आखिर कब हादसों पर लगाम लगाने में आप कामयाब हो पाएंगे? रेल हादसे क्यों होते, क्यों गवांनी पड़ती है यात्रियों को अपनी जान? इन्ही तमाम सवालों के बीच में एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या वाकई रेलवे यात्रियों की सुरक्षा करने में नाकाम रही है?

वैसे तो रेलवे के इतिहास पर अगर गौर किया जाए तो बड़े-बड़े हादसों का जिक्र मिलता है। रेलवे के इतिहास के हादसों पर बाद में चर्चा करेंगे, उससे पहले हाल ही में हुए रेलवे हादसा पर नजर डालते है। जी हां, आपको बता दूं कि कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस शनिवार शाम मुजफ्फरनगर के खतौली में हादसे का शिकार हो गई।उत्कल एक्सप्रेस की कई बोगियों के पटरी से उतरने की वजह से यह हादसा हुआ है।हादसें में कई लोगों की मौत होने की खबर के साथ ही भारी संख्या में लोग घायल हो चुके है। यह एक बड़ा हादसा है, हादसा क्यों हुआ, इसके पीछे अभी तक बताये जाने वाले कारणों में से एक कारण यह भी बताया जा रहा कि यह हादसा प्रशासनिक लापरवाही की वजह से हुई है।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

जानियें, क्यों बढ़ रही है बेरोजगारी?

वर्तमान समय में भारत विश्व की सबसे ज्यादा तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। इसके बावजूद देश का युवा बेरोज़गार घूम रहा है और उसे नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरे  खानी पड़ रही है। सरकारी नौकरी की तो बात ही छोड़िये जनाब, लोगों को निजी कंपनियों में नौकरी पाने में भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, योग्यता होने के बावजूद उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है या कार्य के अनुसार वेतन नहीं दिया जाता है। आखिर लोगों को नौकरी के लिए इतनी परेशानियों का सामना क्यों करना पड़ रहा है? आइये इसके एक पहलू पर नजर डालते है!

    एक सर्वे के मुताबिक देश में अब युवाओं ने नौकरी ढूंढ़ना छोड़ दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण कार्य के मुताबिक वेतन नहीं मिलना है। कंपनियां लोगों में कौशल तो चाहती है, लेकिन उन्हे उनके कौशल के अनुसार वेतन नहीं देना चाहती। यदि किसी वेबसाइट पर जाकर किसी छोटी नौकरी का विज्ञापन देखे तो पाएंगे कि उस नौकरी के लिए एक व्यक्ति में पचास तरह के कौशल और तीन से पांच साल के अनुभव की मांग की जाएगी। लेकिन वेतन के नाम पर केवल आठ से दस हजार रूपये दिए जाएंगे, जबकि सरकार के अनुसार एक व्यक्ति की प्रतिमाह न्यूनतम आय 15 हजार होनी चाहिए। कुछ लोग अधिक समय से नौकरी ना मिलने के कारण  कम वेतन में काम करने को तैयार हो जाते है।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

तो क्या शरद बनेंगे लालू के मसीहा?

बिहार की राजनीतिक दंगल की गाड़ी सरकार टूटने से, सरकार बनने से होते हुए, अब कयासों पर आ चुकी है। जी हां, पिछले कुछ दिनों में बिहार की राजनीति में जो कुछ भी घटित हुआ, उससे पूरा देश भलीभांति परिचित है। सीएम नीतीश के इस्तीफे से लेकर बीजेपी संग सरकार बनाने से जहां एक तरफ सियासी गलियारों में खलबली मच गई थी, वहीं जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव की चुप्पी सभी को खटकने लगी थी।

सत्ताधारी पार्टी से लेकर विपक्ष की निगाहें भी राजनीति के इस  दिग्गज खिलाड़ी पर टिकी हुई थी। जहां एक तरफ बिहार की नयी-नवेली सरकार शरद यादव को अपने खेमे में बता रही थी, तो वही दूसरी तरफ राजद प्रमुख लालू यादव ने तो दावा भी कर दिया था कि शरद यादव उनके साथ है। इन सभी बातों को मद्देनजर रखते हुए आखिरकार आज शरद यादव ने बिहार की राजनीति में आये भूचाल पर अपनी चुप्पी तोड़ ही दी।


रविवार, 30 जुलाई 2017

हाशिये पर विपक्ष!


किसी भी लोकतांत्रिक देश को सुचारू ढंग से चलाने के लिए जितनी आवश्यकता सरकार की होती है, उतनी ही आवश्यकता विपक्ष की भी होती है। किसी भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था कितनी मजबूत है, यह बात विपक्ष पर ही निर्भर करती है। दरअसल,  वह विपक्ष ही होता है, जो सरकार के हर फैसलें में से यह तलाश कर सकता है कि सरकार के फैसले का जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा यानि जनता के लिए क्या सही है और क्या गलत है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, ऐसे में यहां विपक्ष की जिम्मेदारियां और भी गहरी हो जाती है, लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह से लगातार विपक्ष हाशिये की तरफ बढ़ता जा रहा है, ऐसे में यहाँ सवाल यही खड़ा होता है कि क्या वास्तव में विपक्ष हाशिये पर आ चुका है ?

जी हाँ, 2014 में हुए सोलहवीं लोकसभा चुनाव से जिस तरह से पूरे देश में बीजेपी की लहर चली, उस लहर ने देश की सबसे बड़ी पार्टी यानि कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया । यहीं से विपक्ष पर हाशिये पर पहुँचने का खतरा मंडराने लगा था, लेकिन एक साल बाद दिल्ली और बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी की करारी हार से लगने लगा था कि अभी भी विपक्ष मैदान में है। लोकसभा चुनाव में प्रचण्ड बहुमत से जीत हासिल करने वाली बीजेपी का दिल्ली और बिहार में  ऐसा हश्र होगा यह तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा! लेकिन बीजेपी शांत बैठने वाली नहीं थी, इसका जवाब उसने अभी हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में देश के सबसे बड़े राज्य यानि यूपी में अपनी शानदार प्रदर्शन के साथ ही पांच में से चार राज्यों में अपनी सरकार बनाकर एक बार फिर से विपक्ष को औंधे मुँह गिरा दिया।

शनिवार, 29 जुलाई 2017

तिरंगें का अपमान क्यों ?

देश का राष्ट्रीय पर्व स्वंतत्रता दिवस करीब है, ऐसे में जहां पूरा देश इस पर्व को मनाने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग  है, जो तिरंगें का अपमान करते हुए नजर आ रहे है। जी हां, मैं बात कर रही हूं जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ़्ती की। आज उन्होंने जो बयान दिया है, वह एक विवादित बयान होने के साथ ही शर्मनाक बयान भी है। आपको बता दूँ कि कश्मीर की सीएम ने कहा कि धारा-35(a) में बदलाव नहीं होना चाहिए, अगर ऐसा हुआ तो कश्मीर में कोई झंडा नहीं फहराएगा, साथ ही न ही कोई झंडे को कंधा देगा! सीएम साहिबा यही नहीं रुकी, उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि जम्मू-कश्मीर में अगर झंडा जमीन पर भी गिरा होगा, तो कोई उठाएगा भी नहीं।


क्यों दिया उन्होंने ये शर्मनाक बयान!
दरअसल, सीएम साहिबा धारा-35(a) में बदलाव न करने के पक्ष में है, उनकी माने तो इस धारा में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने धमकी भी दे डाली कि 'अगर ऐसा हुआ तो जम्मू-कश्मीर में तिरंगा नहीं फहराया जाएगा।' मैडम का कहना है कि धारा-35(a) जम्मू कश्मीर को विशेष स्थान दिलाता है, खैर यह सच भी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस धारा में परिवर्तन करना चाहता है।

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

भईया जी से आज मैंने ब्रेकअप कर लिया....

भईया जी से आज मैंने ब्रेकअप कर लिया.... जी हां, बिहार के नये नवेले सीएम नीतीश कुमार कल से यही गाना गुनगुना रहे होंगे। साथ ही लालू यादव भी जवाब में यही गुन-गुना रहे होंगे कि 'बिन बताये तूने, ये सब कैसे कर लिया।'
गानों की बात तो अपनी जगह है लेकिन बिहार की सियासी गलियारों में  हर कोई अलग-अलग गानों से अपनी भड़ास निकाल ही रहा होगा! वहीं राहुल गांधी की बात करें तो बिहार में आये भूचाल पर वो यही गाना गुना रहे होंगे कि 'तू प्यार है किसी और का, तुझे चाहता कोई और है,  तू नजर में है किसी और की, तुझे देखता कोई और है!'  खैर सपा की बात की जाए तो सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो ट्वीट करके ही अपने दिल की बात जगजाहिर ही कर दिया। अखिलेश ने बिहार के सियासत पर लिखा कि 'ना-ना करते प्यार तुझी से कर बैठे।'

अब आप सोच रहे होंगे कि मैं आपको गाने क्यों गिना रही हूं तो आपको बता दूं कि अक्सर जब भी किसी का ब्रेकअप होता है, तो वह गानों में ही डूब जाता है।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

आरक्षण का दायरा

आरक्षण! आरक्षण! आरक्षण! सिर्फ आरक्षण की ही गूंज देश में गूँज रही है फिर बात चाहे किसी भी प्रकार के आरक्षण की ही क्यों न की जाए। आज देश में हर किसी को आरक्षण चाहिए। किसी को जाति के आधार पर तो किसी को धर्म के आधार पर। आरक्षण का उचित दायरा क्या है, इसका निर्धारण कौन करेगा? संविधान में आरक्षण के लिए कई नियमों का उल्लेख किया गया है। आरक्षण पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से दूर करने के लिए दिया जाता है।


हाल ही में हो रहे जाट आंदोलनों की बात की जाए तो ये एक ऐसा समुदाय है, जिसमें लोगों के पास महँगी से महँगी गाड़ियां, महँगे से महँगे कपड़े, अच्छा-खासा घर है लेकिन फिर भी ये लोग आरक्षण की मांग कर रहे है। आंदोलन एक बार फिर शुरू हो गया है। पिछले साल हुए जाट आंदोलन में जाटों ने हिंसक रवैया अपनाया था। आंदोलन में कई लोगों की जान गई थी, इसके अलावा तोडफोड़ के कारण काफी नुकसान भी हुआ था। आरक्षण की आड़ में हिंसात्मक रवैया कहाँ तक उचित है? यहां कई सारे सवाल खड़े होते है, आंदोलन में मरने वाले लोगों का जिम्मेदार कौन? तोड़फाड़ में हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा? हद तो उस समय हो जाती है जब लोग ऑडी और बी.एम.डबल्यू जैसी लक्ज़री गाड़ियों से उतरकर आंदोलन का हिस्सा बनकर आरक्षण की मांग करते है। क्या ये लोग इस बार इस बात की जिम्मेदारी लेंगे कि इस बार आंदोलन में किसी प्रकार तोडफोड़ या हिंसा नहीं की जाएगी?

मंगलवार, 14 मार्च 2017

ईवीएम पर बवाल!


यूपी के सोलहवीं विधानसभा चुनाव के नतीजे पर सवाल उठने लगे है। नतीजे पर सबसे पहले सवाल बसपा सुप्रीमो मायावती ने उठाते हुए कहा कि ईवीएम में खराबी है,इसकी जांच होनी चाहिए! इतना ही नहीं उन्होंने चुनाव आयोग से आग्रह किया कि चुनाव के लिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल करके दोबारा चुनाव कराया जाये। बहरहाल आयोग ने मायावती के आरोपों को बेबुनियाद करारते हुए मामला को ख़ारिज कर दिया। बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ समस्त विरोधी पार्टी सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे है।

            ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका जताई गई हो। इतिहास के पन्नों पर अगर गौर किया जाये तो 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि उसने ईवीएम से छेड़खानी की। 2009 के चुनाव में तो विरोधी पार्टी यानि बीजेपी के दो दिग्गज नेताओं ने ईवीएम की गड़बड़ी पर बाकायदा पुस्तक लिख डाली थी। पुस्तक का शीर्षक था कि democracy at risk/can we trust our electronic machine? इस पुस्तक में ईवीएम के धोखाधड़ी का खुलासा किया गया है। ईवीएम पर सवाल खड़े करना कहाँ तक उचित है या फिर सीधे-सीधे लोकतंत्र की प्रणाली पर सवाल उठाना कितना सही है? क्या वाकई ईवीएम घोटाला हो सकता है या फिर करारी शिकस्त से विरोधी पार्टियां खिसियानी बिल्ली की तरह बौखला जाती है?

यूपी में कमल खिला

यूपी के चुनावी दंगल में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत मिली। इस बार यूपी के विधानसभा चुनाव में न सिर्फ बम्पर वोटिंग हुई अपितु ऐतिहासिक नतीजा भी सामने आया। सोलहवीं विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके गठबंधन ने 403 में से 325 सीटों पर जीत हासिल किया। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही बीजेपी ने यूपी में अपना सूखापन दूर कर लिया। खैर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में किसी पार्टी ने इतनी बड़ी जीत हासिल की हो। इतिहास के पन्नो पर अगर गौर किया जाये तो बीजेपी से पहले कई पार्टियों ने 300 से ज्यादा सीटें जीती थी।

वैसे तो हर बार यूपी का चुनावी नतीजा चौकाने वाला ही आता है;लेकिन इस बार का नतीजा इसलिए खास बन जाता है क्योंकि जीत हासिल करने वाली पार्टी यानि बीजेपी को भी अपनी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी। इस बार का चुनाव इसलिए भी खास रहा क्योंकि देश के पीएम ने चुनाव में अपनी आन-बान-शान झोंक दी थी। इस चुनाव में तमाम बुद्धजीवियों का गणित भी असफल हो गया। चुनावी नतीजा ने यूपी की रुपरेखा ही बदलकर रख दी। यूपी की जनता ने न सिर्फ परम्पराओं को तोड़ा बल्कि उन सभी को मुहं तोड़ जवाब दिया;जो कहते थे यूपी की राजनीती परम्परावादी है।।खैर अब तो यूपी की राजगद्दी पर अगले पांच सालों तक बीजेपी ही विराजमान रहेगी।

रविवार, 12 मार्च 2017

होलिका दहन

घर में बच्चे फ़ोन और कंप्यूटर पर लगे हुए हैे,,इतने में ही घर के आंगन से बूढी दादी के चिल्लाने की आवाज आई कि 'अरे कम्बख्तों रोज तो घुसे ही रहते हो इस डिब्बे में, आँख फुट जायेगी। जरा भी लाज-शर्म बची हो तो बाहर आ जाओ पता है न कि कल क्या है'।
अंदर से रामू झल्लाता हुए बोला 'अरे दादी आप भी न, परेशान मत कीजिये,होगा जो भी होगा, हमे क्या लेना देना।' इतना कहता हुआ रामू फिर कंप्यूटर में घुस गया!

ये सुनते ही दादी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया....दादी गुस्से में अरे वो ये डिब्बा ही सारा जीवन काम न आएगा..जल्दी बाहर आओ....
दादी की बात का मान रखते हुए बच्चे बाहर आये और बोले की दादी जल्दी से बताओ कल क्या है,,, फेसबुक पर पिक पोस्ट की है,दोस्त लाइक और कमेंट कर रहे होंगे!
(ये सुनते ही दादी ने मन ही मन ये तय किया कि इन बच्चों को इनके ही अंदाज में समझाना होगा)
दादी ने कहा रामू-पिंकी तुम दोनों को फेसबुक पर वो क्या कहते है(दादी याद करते हुए शब्द को) तुम्हारी भाषा में पिक पोस्ट करना अच्छा लगता है न...दोनों ने कहा 'हाँ दादी बहुत अच्छा लगता है हमारा बस चले तो पूरे दिन पिक पोस्ट करते रहे'...(दोनों फेसबुक का गुणगान गाने में डूब गए)
दादी (प्रसन्न मन से) दोनों को चुप कराती हुई कि अरे चुप भी हो जाओ कम्बख्तों,जान खा रखी है, अब जो मैं कहने जा रही हूँ उसे ध्यान से सुनो! (दोनों मौन हो गए)
दादी दोनों के सर पर हाथ फेरते हुये बोली कि 'कल होलिका दहन है'।
ये सुनकर दोनों चौक गये बोले कि 'दादी ये क्या होता है,हम तो बस होली के बारे में ही जानते है।'
दादी (मुस्कुराती हुई) होलिका दहन के महत्व  को समझाते हुए बोली कि 'भोर में जगकर हम होलिका दहन में जाएंगे'
ये सुनते ही दोनों दुखी हो गए और बोले 'दादी कौन उठता है इतनी सुबह, जब तो हमारे सोने का टाइम होता है और आप उठने के लिए बोल रही है, नॉट फेयर दादी।'(दोनों कमरे की ओर जाने लगे)
इतने में दादी बोल पड़ी कि 'अरे मेरे दिल के टुकड़ों असली बात तो बताई ही नही मैंने'
दोनों के बढ़ते कदम रुक गये बोले कि 'अब क्या है दादी,इतना तो बोर हो चुके है हम,और कितना होना बाकी है!'
दादी (मंद स्वर में) बोली कि 'होलिका दहन पर पिक क्लिक करेंगे,जिसे तुम दोनों अपने फेसबुक पर पोस्ट कर सकोगे, सारे दोस्त बहुत लाइक करेंगे,बहुत वाहवाही होगी'।
दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा बोले 'दादी, क्या बोला आपने वहां सेल्फी ले सकते है हम'
दादी बोली 'हाँ बच्चो'....बच्चे फ़ोन में सुबह का एलार्म लगा कर सोने चले गए!
(भोर का समय)
ट्रिंग ट्रिंग....की सुनहरी आवाज में एलार्म बजा...
(दोनों जग गये) दादी दादी कहा हो आप ये चिल्लाते हुए दोनों कमरे से बाहर आ गए....'दादी जल्दी चलो,वरना हम लेट हो जायेंगे,फिर हमसे पहले कोई और फेसबुक पर पिक पोस्ट कर देगा'... दादी अरे मैं यही हूँ मेरे बच्चों चलो.....
(घर से थोड़ी ही दूर पर होलिका दहन का कार्यक्रम) रास्ते भर मटरगस्ती करते हुए दोनो यही बात कर रहे थे कि 'आज तो फेसबुक पर हमारा ही क्रेज होगा'
(होलिका दहन के स्थान पर पहुँचे)
दादी ने दोनों को होलिका दहन की विधि बताई,,,, दोनों ने पूजा अर्चना की...उसके बाद ढेर सारी तस्वीरे खीची...
पिंकी बोली दादी आज तो मजा आ गया अब तो मैं अपने सारे फ्रेंड्स को बताऊंगी होलिका दहन के बारे में...अब से हम हर होलिका दहन पर आएंगे क्यों रामू भैया...रामू ने बोला 'हाँ दादी, आई लव यू दादी, यू आर द बेस्ट इन वर्ल्ड'
बच्चो को ख़ुशी देख,दादी मन ही मन मुस्कुराई और बोली कि 'जिस तरह से तुम दोनों मेरी बात समझ गए वैसे ही अगर सभी बच्चे समझ जाए,तो हमारी परम्पराये सुरक्षित रहेंगी','आज मेरा जीवन सुफल हो गया'।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

महिला दिवस स्पेशल


आज फिर मंच सजा है। लंबे-लंबे व्याख्यान हो रहे है, बड़ी-बड़ी बातें हो रही है,महिला सशक्तिकरण की। योजनाओं की घोषणाएं हो रही है, तालियां बज रही है,मीडिया कवर कर रही है- ये सब देख रही है शारदा
(गांव की रहने वाली शारदा ये सब देखकर बहुत ही दुविधा में पड़ गयी और सोचने लग गई कि क्या वाकई आज की महिला आजाद है, मैं भी पापा को जाकर बोलती हूँ कि मुझे स्कूल जाना है।)
शारदा दौड़ी-दौड़ी गई और पापा से बोली कि 'आज महिला दिवस है।
पापा ने कहा 'हाँ'
शारदा ने मासूमियत भरी आवाज में कहा कि पापा वो शहर के कुछ बड़े-बड़े लोग आये है, महिलाओं की आजादी की बात कर रहे है और कह रहे है कि आज की महिला अपने फैसले लेने के लिए आजाद है। ये सुनकर पापा बोले कि बिटिया वो अपने मतलब की बात नहीं है, तू जाकर अपना काम कर। शारदा बोली 'पापा मुझे भी स्कूल जाना है, भाई के जैसे पढ़कर आपका नाम रोशन करना है।' शारदा की बात सुनकर पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और बोले कि 'चुपकर छोरी ये क्या बोल रही है तू,तेरा दिमाग घास चरने गया है क्या, छोरिया घर में ही अच्छी लगती है।'
(पापा की बात सुनकर शारदा रोने लगी और दौड़कर उसी जगह गई जहां मंच सजा है)
शारदा चिल्लाकर बोली 'बन्द कीजिये ये तमाशा बहुत हो गई आपकी बड़ी-बड़ी बातें, क्या फायदा आपके इन बातों का, जब आज भी मुझ जैसी हजारों लड़कियां स्कूल नहीं जा पाती है।'
(शारदा के सवालों का जवाब मंच पर मौजूद किसी के पास नहीं,सब मौन हो गए)
शारदा फिर बोली कि 'आप लोगों की तो आज बहुत तारीफे होगी, पुरस्कार मिलेंगे, खूब वाहवाही होगी, लेकिन क्या आप लोगों ने कभी जमीनी स्तर पर काम करने के बारे में सोचा है, नहीं सोचा न?  अगर सोचते तो आज आप यहां मंच पर खड़े होकर भाषण देने के बजाय मुझ जैसी लड़कियों को स्कूल भेजने का काम करते।'
(शारदा की बहादुरी को देखकर लोगों ने जमकर तालियां बजाई)
शारदा की बात को सुनकर मंच से एक बुद्धजीवी बोले कि बेटा तू सही बोल रही है, आज हमें अपनी गलती का एहसास हुआ अब से हम जमीनी स्तर पर ही काम करेंगे और तुम जैसी लड़कियों को स्कूल तक पंहुचा कर ही रहेंगे।
(बुद्धजीवी की बात सुनकर तालियां बजने लगी)
शारदा के पापा ये सब देख रहे थे उन्होंने बोला कि 'मुझे माफ़ कर दो बेटी, आज से तुम स्कूल जाओगी'
शारदा बोली 'सच्ची पापा, मैं स्कूल जाऊंगी और पढूंगी?'
पापा-'हाँ बेटा'
शारदा पापा से बोली कि 'आज मैं तो स्कूल जा पाऊँगी, लेकिन अब भी कुछ लड़कियां है जो  स्कूल नहीं जा पा रही है, अगर वो भी स्कूल जाने लगेंगी, तो सही मायने में महिला दिवस का उद्देश्य पूरा होगा।'
(शारदा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और वो हंसती-मुस्कुराती घर गई)

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

यूपी का चुनावी घमासान



यूपी में चुनावी माहौल का घमासान चरम पर चुका है। सत्ताधारी और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। राजनिति के गलियारों से आरोप-प्रत्यारोप का घिनोना खेल खेला जा रहा है। यूपी के चौथे चरण के चुनाव प्रचार में ही राजनीति के धुरंधर अपने असली रंग में नजर आने लगे है। चुनावी रैलियां तो ऐसी लग रही है जैसे मैदान--जंग का ऐलान किया जा रहा हो " देखे जरा किसमे है कितना दम" ये गीत यूपी के चुनावी माहौल के लिए बिल्कुल सटीक है।
  प्रदेश में विकास करना, भ्र्ष्टाचार से मुक्त कराना ये सारी बातें तो जैसे सदियों पुरानी हो चुकी है। कोई भी राजनीतिक दल इन जरूरी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है। कौन कहे इन नेताओं से कि युवाओं को रोजगार, गरीबों को दो वक्त की रोटी और महिलाओं को सुरक्षा चाहिए। लेकिन ये राजनीति के खिलाड़ी इन मुद्दों को भूल कर आपसी रंजिश को प्राथमिकता देने में लगे हुए है।। कब कौन क्या बोल जाए, कब सियासी गलियारे में नया मोड़ जाए इस बात से सभी अंजान है। बात चाहे बीजेपी के स्टार प्रचारकों की जाए या  सपा के स्टार प्रचारकों की जाए या फिर अन्य विपक्षी पार्टियों के प्रचारकों की जाए, इन सभी नेताओं के बोल बोखलाए हुए भेड़िए की तरह हो गए है।
इस चुनाव में अन्य चुनाव की तरह प्रदेश में भेदभाव या कहे कि भड़काने की राजनीति का नजारा भी देखने को मिला। मसलन के तौर पर यूपी के फतेहपुर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ताधारी पार्टी पर राज्य में भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार क़ब्रिस्तान बनाती है तो श्मशान का भी ध्यान रखे। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि यदि रमज़ान में बिजली दी जाती है तो दिवाली में भी बिजली दी जानी चाहिए। वहीं दूसरी तरफ बसपा सत्ताधारी सरकार को दलितों का विरोधी बताती नहीं थक रही है। इतना ही नहीं भेदभाव की इस गंदी राजनीति में सत्ताधारी पार्टी यानि सपा भी दूसरी पार्टियों पर हल्ला बोलने में पीछे नहीं है।
भारत के सबसे बड़े राज्य में जहां इन नेताओं को एकता की मिसाल देनी चाहिए थी जिससे देश में आपसी भाईचारा बढ़ने में मदद मिले, लेकिन वहां ये राजनीति के दिग्गज देश-प्रदेश की जनता को भड़काने का काम करने से बाज नहीं रहे है। धिक्कार है ऐसे पार्टियों पर जो अपने फायदे के लिए देश की अखंडता को कमज़ोर करने का काम कर रही है। जरा तो शर्म करो मान्यवर नेतागण! क्या आपने कभी सोचा है कि आप आने वाली पीढ़ियों को विरासत में क्या दे रहे हो? अगर नहीं सोचा है तो अब भी वक्त है कि गंदी राजनीति के गलियारों से निकल कर साफ़ सुथरा भारत बनाने की ओर रुख कीजिए। सभी पार्टियां महज अपना उल्लू सीधा करने के लिए किस हद तक जा सकती है, ये देश-प्रदेश की जनता से छुपा नहीं है। इसलिए जनता को इनकी बातों में ना आकर एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहिए जिसमें सभी लोग मिल-जुल कर एकता के साथ रहे।