रविवार, 24 सितंबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: बीएचयू की छात्राओं का प्रदर्शन, कब मिलेगी सुरक्षा?

यूं ही तो नहीं कोई किसी से भिड़ जाता है. यूं ही तो नहीं कोई कहीं बैठ जाता है. तो क्या कारण रहा होगा कि BHU की छात्राओं को प्रदर्शन के लिए विवश होना पड़ा ? क्या कारण रहा होगा कि एन्टी रोमियो स्क्वाड अपने लक्षित उद्देश्य में असफल रहा ? जबकि उसका प्रचार तो बड़ी धूम-धाम से किया गया था. वो सत्ता पक्ष के गलियारों का बैनर भी था. चुनावी घोषणा पत्र से लेकर उपलब्धियों के आत्म-प्रशंसन तक उसे शीर्षस्थ रखा गया और आज हालात ये हैं कि छात्राओं को प्रदर्शन करना पड़ रहा है । 
 
कल जब प्रधानमंत्री मोदी अपने संसदीय क्षेत्र बनारस के दौरे पर निकलते हैं तो पाते हैं कि
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राएं अपने खिलाफ हो रही छेड़छाड़, प्रशासन की सुस्ती और अपीजमेन्ट को लेकर प्रदर्शन कर रही हैं और विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरने पर बैठी हैं। BHU किसी गली के नुक्कड़ का कॉलेज तो है नही, प्रख्यात विश्वविद्यालय है। प्रदेश का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान है।और वो भी कहाँ- प्रधानमंत्री के अपने संसदीय क्षेत्र में ! यदि वहां पढ़ने वाली ही छात्राएं ही सुरक्षित नही हैं, तो फिर अन्य सामान्य कॉलेजों की छात्राओं की सुरक्षा और सुविधा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

प्रदेश में आये दिन ऐसी खबरों से स्थानीय अखबार पटे पड़े रहते हैं. एक वहशत की खबर पुरानी नहीं पड़ती कि अगले ही दिन फिर कोई बच्ची, बेटी, बहन दरिंदों की दरिंदगी का शिकार हो जाती हैं. आंकड़े सिर्फ़ एक गिनती हैं. गिन लो, भूल जाओ. आंकड़ो से अब किसी को चैन नहीं मिलता. इसलिए आंकड़े देने का अब कोई मतलब नहीं रह जाता. कहां तक गिना जाए. कहां तक कहा जाए. जब हर ओर कींच फैली हो, तो क्या सूखा क्या गीला ? 

प्रश्न उठता है कि सरकार कुछ क्यों नहीं करती ? क्या वो इन घटनाओं से अनजान है ? ऐसा तो नहीं है. क्या वो हर रोज छपते एक ही प्रकार के अपराध नहीं देखती ? देखती है तो क्या करती ? प्रशासन को किस प्रकार की कार्रवाई के आदेश हैं ? जब शुरू शुरू में सरकार बनी थी, तो सभी को बड़ी आशा थी. पूर्ण बहुमत की सरकार है, कुछ कड़े निर्णय लेगी. परिवर्तन आएगा. लगा भी वैसा, जब आनन-फानन में एन्टी रोमियो स्क्वाड का गठन कर दिया गया. लोग आशान्वित थे और खुश भी. फिर लोग परेशान हो गए. प्रशासन कन्फ्यूज़ था, किसे पकड़े किसे छोड़े ? पुलिस के साथ साथ और भी कई प्रकार के अबूझ दस्ते शामिल हो गए. मनमानियां होने लगीं. संस्कृति के नाम पर कई प्रकार की प्रताड़नाओं के साक्ष्य सामने आने लगे. विरोध मुखर होते गए. नए नए आदेश जारी हुए. समय- समय पर संयम बरतने की हिदायतें दी गईं. राजनैतिक तड़के लगे और फिर सब कुछ ठंडा पड़ गया. चैंनलों को लपटें दिखाई देनी बन्द हो गईं, चैंनलों ने कवर करना बंद कर दिया. पर्दा गिर गया, मतलब सब कुछ हो लिया. मीडिया ख़तम, मुद्दा ख़तम. हालात वही रहे. ज़मीन वही रही. जो दो-चार उचक्के कूटे गए थे, वे झाड़- फूंक कर फिर वापस आ गए. और अब हालात जो हैं, वे दर्शनीय हैं. प्रधानमंत्री का दौरा है और छात्राएं जबाब मांग रहीं है. आश्वासन तक नहीं हैं. ऊपर से सत्ता विरोधी राजनैतिक षड्यंत्र का दोषारोपण. दबाब. और लाठीचार्ज ! अति तो तब हो गई जब प्रतिक्रिया स्वरूप हुई हाथापाई को काबू करने के लिए ही सही पर हवाई फायरिंग तक कि गयी. क्या किसी की शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया का वज़न इतना अधिक होता है कि सत्तासीन उसे फायरिंग के धुएं में उड़ाने लगें ? क्या जबाबदेही मृत हो चुकी है ? ये क्रूरता की अति है या जर्जरता की निशानी ? जो भी है, है बड़ा भयावह ! 

ढिंढोरा पीटते रहने से बहरा सुन तो नहीं लेता. हां, ढिंढोरे की अहमियत जरूर गिर जाती है. किस से शिकायत की जाए ? कब तक शिकायत की जाये ? कौन सुनेगा ? कौन कहेगा ? अभी प्रधानमंत्री जी का दौरा था, तो खबर बनी. न होता तो ? ये पूरी परिघटना किसी स्थानीय अखबार का कोना बनकर रह जाती ! ऐसे ही होता है. बहुत हिम्मत के बाद भी जब कोई हिम्मत जुटा पाता है. अपने आप की समस्यायों से उबर पाता है. और आवाज़ बुलंद करता है तो उसे दबा दिया जाता है. कभी धन से, तो कभी बल से. छल, दम्भ, द्वेष, पाखंड, झूठ सब जुटा लिए जाते हैं धूल डालने के लिए. और अंततः परिणिति ये होती है, कि विरोध को जो अहमियत मिलनी चाहिए थी, नहीं मिल पाती. और सारी क़ायनात वैसी की वैसी ही रह जाती है. दरअसल और बदतर ! वजह ? वज़ह ये की आज देश मे अहमियत देने वालों के लिए अहम व्यक्ति मायने रखते हैं, अहम मुद्दे नहीं !

ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ़ एक जगह, एक सरकार, या एक वक़्त की बात है. नहीं ! हर बार, हर सरकार, हर वक़्त यही वक़्त रहा है, यही वक़्त रहता है. सरकारें बदल जातीं हैं, व्यवस्थाएं नहीं बदलतीं. दशाएं नहीं बदलतीं. हालात नहीं बदलते. व्यक्ति जरूर बदल जाते हैं पर उनके किरदार नहीं बदलते. व्यक्तित्व जड़ रहते हैं. ये समूचे देश के हालात हैं. कानून की कमी नहीं है. अधिकार की कमी नहीं है.नियमों का पूरा पोथा है. प्रशासन है, सरकार है मगर फिर भी बदस्तूर अपराध हैं. बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ के दौर में भी बेटी घर की चौखट से लेकर कॉलेज के गेट तक भयमुक्त नहीं है. सुरक्षित नहीं है. सवाल ये भी है कि कानून कितना कारगर है ? क्या अकेला कानून इतना सामर्थ्यवान है कि उसके होने मात्र से समस्यायों का निराकरण हुआ मान लिया जाए ? या कुछ और भी तत्त्व हैं, जो इनके लिए जिम्मेदार हैं. ये केवल व्यवस्थाओं की कमीं भर नहीं है. सामाजिक धारणाओं का ओछापन, कुत्सित मानसिक प्रवृत्तियां और अपीज़मेंट इनकी तह में हैं. हर आदमी के पीछे एक आदमी होता है. वो आदमी बड़ा आदमी होता है. वो इतना बड़ा होता है कि उसके सामने बड़ी से बड़ी हरक़त बौनी होती है. वही कर्णधार होता है. वही गुनहगार होता है. यदि उसकी शक्ति को कुचल दिया जाए, क्षीण कर दिया जाए, तो ये पुतले अपने आप बिखर जाएंगे. पर कहा जाता है कि ताश की गड्डी का हर एक पत्ता दूसरे किसी भी पत्ते से संलग्न होता है. एक भी पत्ता जो अपनी जगह से हिल गया, समझो गड्डी बिखर जाएगी. ये राजनीति के चोंचले हैं, जो किसी को शह तो किसी को मात देते आये हैं. यदि राजनैतिक तिकड़मों में फांसकर राई को पर्वत और गुड़ का गोबर न किया जाए तो कभी भी व्यवस्थाएं सुधारी जा सकतीं हैं. बस जरूरत है सिर्फ़ दृढ़ राजनैतिक निर्णयों और वास्तविक इच्छाशक्ति की !

" इस महागर्त के भीषण में परिणाम कोई हो सकता था,
यदि राजनीति का दम्भ न होता, राम कोई हो सकता था !! "


लेखक- अर्पित (@Arpit - smt2425@gmail.com)

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