'विकास' एक बहुत ही पेंचीदा चीज़ है. ज़्यादा पढ़े-लिखे और डिग्रीधारी इसकी
मनगढंत परिभाषा गढ़ते रहते हैं. और सत्ता से दूर व्यक्ति इसे मात्र छलावा
मानते हैं. कुछ लोग इसे दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प से उपजी मानवनिर्मित कृति
भी कहते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं. ये सब कोरी कल्पनायें मात्र हैं. दरअसल
विकास एक निखालिस प्राकृतिक वस्तु है. एकदम परिस्थितियजन्य. कुकुरमुत्ते की
भांति. और हमेशा कूड़े-करकट में ही पैदा होता है.
इतिहास गवाह है कि जब जब
देश में भूख और भीख जैसा घटियापन बढ़ा है; विकास उपजा है. उपजा क्या नाचा
है. और ऐसा नाचा कि पल दो पल तो सारी क़ायनात विकासमय हो गई. चारों ओर विकास
विकास हो लिया. सारी आवाज़े धूमिल हो गयीं. लोग बिलबिला गए.
बोर हो गए. विकास से उबरने के रास्ता तलासने लगे. और तब कहीं जाकर विकास ठंडा पड़ा. पर हम विकासशील देश हैं साहब, एक विकास जाता है अगला आ जाता है. परवर्ती विकास हमेशा पूर्ववर्ती विकास पर भारी पड़ता है. आजकल विकास कुलांचे मार रहा है. विपक्ष का कहना है कि 'विकास पगला गया है' और आने वाले विधानसभा चुनावों में अब वे गुजरात का विकास करवायेंगे. पर मौजूदा विकास गंध उड़ाये है. लोग सांस नहीं ले पा रहे. एक विकास गले से नहीं उतरता. नया विकास फूट पड़ता है. रोज एक नया विकास पैदा हो रहा है. ज़्यादातर आदमी विकसित घूम रहा है. करने को काम नहीं है खाने को नाज नहीं है, फिर भी जिंदा है. ये विकास नहीं तो और क्या है. कभी आदमी तेल पीता था, दाल-भात खाता था. आज डेटा पी रहा है. हवा खा रहा है. ये नए वाले विकास का चमत्कार है.
बोर हो गए. विकास से उबरने के रास्ता तलासने लगे. और तब कहीं जाकर विकास ठंडा पड़ा. पर हम विकासशील देश हैं साहब, एक विकास जाता है अगला आ जाता है. परवर्ती विकास हमेशा पूर्ववर्ती विकास पर भारी पड़ता है. आजकल विकास कुलांचे मार रहा है. विपक्ष का कहना है कि 'विकास पगला गया है' और आने वाले विधानसभा चुनावों में अब वे गुजरात का विकास करवायेंगे. पर मौजूदा विकास गंध उड़ाये है. लोग सांस नहीं ले पा रहे. एक विकास गले से नहीं उतरता. नया विकास फूट पड़ता है. रोज एक नया विकास पैदा हो रहा है. ज़्यादातर आदमी विकसित घूम रहा है. करने को काम नहीं है खाने को नाज नहीं है, फिर भी जिंदा है. ये विकास नहीं तो और क्या है. कभी आदमी तेल पीता था, दाल-भात खाता था. आज डेटा पी रहा है. हवा खा रहा है. ये नए वाले विकास का चमत्कार है.
विकास जब नया नया आया था, तो खाता खुलवाया था. फिर आधार कार्ड बनवाया. और
अब अंगूठा लगवा रहा है. हर जगह, हर तरह से. जहां अंगूठे से काम नहीं चल रहा
वहां नाक रगड़वा रहा है. जो नाक नहीं रगड़ रहे उनसे घुटने टिकवा रहा है. वो
कह चुका है कि देशहित में विकास कुछ भी करेगा. शुरू शुरू में काले धन की
चर्चा जरूर हुई थी, पर अब तो सब गुलाबी कर दिया है, काले का सवाल ही नहीं
उठता. जैसे गाय काली हो या सफ़ेद दूध तो बराबर देती है. वैसे ही आज का विकास
है. गैयागामी ! आगे आगे गैया, पीछे पीछे विकास. जहां जहां गैया, वहां वहां
विकास. गैया रुक गई या किसी ने रोक दी, वही विकास में बाधक तत्त्व है. उसे
कूट के अलग करो. आगे बढ़ो. तीन साल हो गए हैं. आज भी गैया घूम रही है. और
विकास उसका पीछा कर रहा है. मजाल कि कोई गैया छेड़े ?!
दरअसल इस विकास की अवधारणा हमारे पूर्वजों से ली गई है. महाभारत से,
पांडवों से. देखो किस तरह धर्मराज ने द्रौपदी दांव पे लगा दी थी, और भारत
विश्व गुरु हो लिया था. उसी तरह आज 100% FDI. लगी है द्रौपदी दांव पे.
दिखाए कोई अब भारत को विश्व गुरु होने से रोक के ! JNU प्रकरण क्या है ?
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ! BHU प्रकरण क्या है ? प्रत्यक्ष विदेशी निवेश !
उसी तरह कश्मीर, उड़ी, पठानकोट. 'बाहरी तत्त्व' हैं ! बाहरी से याद आया,
बिहार में भी अब विकास पहुँच चुका है. वो जो 15 के चुनाव में चूक गया था,
17 तक आते आते हो लिया वहां भी. और इतनी जोरदारी से पहुंचा कि वो डैम जो
विकास के नाम पर धब्बा था, उद्घाटन से पहले ही बह गया. ये होता है भय,
प्रभाव, व्यक्तित्व, असली विकास की शक्ति. नीतीश कुमार कहे हैं, दोबारा
बनवाएंगे. विकास नहीं रुकेगा.
प्रधानमंत्री जी का साफ कहना है कि वो किसी भी क़ीमत पर विकास ला कर रहेंगे.
नतीज़तन मंदसौर में जब किसानों ने अपनी फसलों के वाज़िब मूल्यों को लेकर
आवाज़ बुलंद की तो उन्हें गोलियों से भून दिया गया. 13 देशद्रोही किसान मारे
गए. आग ठंडी हो गयी. व्यापम के अंतर्गत बन रहे प्रगतिशील डॉक्टरों की
भर्ती पर जब सवाल उठाए गए तो दर्ज़न भर से ज़्यादा चुगलखोर ठिकाने लगा दिए
गए. एक दो पत्रकार भी थे. बहुत लिख रहे थे. वे नहीं चाहते थे कि अनपढ़ आदमी
डॉक्टर बने. अब नहीं लिख पाएंगे. इस प्रकार 'सबका साथ, सबका विकास' में
जितने भी बाधक तत्त्व हैं, उन्हें करकांटे लगाने का काम ये सरकार बख़ूबी कर
रही है. गोरखपुर के विकास में 415 बच्चे आड़े आ रहे थे. इससे पहले कि
संक्रमण फैलता, सरकार चेत गई. महीने भर के अंदर उनसे ऑक्सिजन छीन ली. ऐसा
ही फर्रुखाबाद में हुआ, जहां 49 बच्चो को विकास के रास्ते से हटा दिया
गया.
अभी हाल ही में जब प्रधानमंत्री बनारस के दौरे पर काशी पहुंचे तो देखा कि
यहां तो कोई विकास ही नहीं है. पता चला BHU की लड़कियां विकास रोके हुए हैं.
वे संस्कृति को साधे हैं, और उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहीं. फिर क्या था, बजी
लाठियां. देवी पूजन के दौर में आधीरात में निहत्थी लड़कियों के भेजे खोल
दिए गए. अब नारियों की पूजा हो ली है वहां, अब देवता निवास करेंगे !
देश के मुसलमान और दलित पूरी तरह सुरक्षित हैं, बशर्ते वह 'विकास' के साथ
हों. उसे सपोर्ट करें. वरना जगह जगह ऊना और अखलाक दिखाई देगा. कश्मीर से
लेकर हैदराबाद तक, और उधर जाधवपुर यूनिवर्सिटी से लेकर JNU तक विकास नंगा
नाच रहा है. लोगों के अंदर एक मिथक था कि इस देश को कोई नहीं सुधार सकता.
कोई इसे लाइन पे नहीं ला सकता. एक झटके में पूरे देश को लाइन में लाने का
काम अगर किसी ने किया है, तो वो यही विकास है. अगले 100 सालों तक इतनी लंबी
कतारों का रिकॉर्ड शायद ही कोई और विकास तोड़ सके. नोटबन्दी की सफलतायो से
उत्साहित होते हुए RBI ने हाल ही में उसकी उपलब्धियों को बयां करते हुए कहा
है कि- आपकी कुर्बानियां व्यर्थ नहीं गयीं हैं. 'जितने भी नोट बाहर थे,
भीतर आ गए हैं'. विकासशील लोग इस पर दूसरी दीवाली मना सकते हैं, जश्न
रख सकते हैं.
✍ लेखक- अर्पित (@Arpit - smt2425@gmail.com)
आपको
जान के खुशी होगी कि अब 'श्रेया की कलम से', युवा आवाजों को भी जगह दे रही
है। अगर आप भी किसी मुद्दे पर अपनी आवाज को बुलंद करना चाहते हैं तो
भेजिये मुझे, आपके लेख को आपके नाम से प्रकाशित किया जाएगा। स्वरचित लेख आप
इस पते पर भेज सकते हैं- aboutshreyapandey@gmail.com।

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