गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी दिवस स्पेशल!

 देश भर में हिन्दी दिवस बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। कई मंच सजे है, हिन्दी के शुभचिंतक हिन्दी दिवस के पावन मौके पर लंबे चौड़े भाषण दे रहे है। इन सबके बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि भाषण देने के बाद अधिकांश विशेषज्ञ हिंदी में बात भी करना पसंद नहीं करते है तो फिर क्यों वो हिन्दी दिवस पर भाषण देते है? खैर, भाषा कोई भी क्यों न हो, वो सम्मान के हकदार है! 


कुछ दिन पहले एक भाषा सिखाने वाले एक इंस्टीट्यूट के बाहर एक होडिंग देखा था मैंने उसमें बड़े ही आकर्षक भाव से ये लिखा था कि 'आइये इंग्लिश में बात करें'।
इतना ही नहीं इस होडिंग में एक खूबसूरत महिला, जिसके चेहरे पर मन को मोहने वाली मोरनी जैसी स्माइल। अब भला, ऐसे खूबसूरत होडिंग को देखकर कोई क्यों न जाये वहाँ इंग्लिश सीखने? खैर, हैरान कर देने वाली बात तो ये है कि हिन्दी की दुहाई देने वाले भी खुद हिन्दी बोलने में शर्म महसूस करते है! 

क्यों मनाया जाता है हिन्दी दिवस..... 

हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है, इससे आप अच्छे से जानते होंगे, फिर भी आपको बताती हूँ कि आखिर क्यों मनाया जाता है हिन्दी दिवस? जी हाँ, 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया था कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी फैसले की वजह से सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को हर साल हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। साथ ही आपको यह भी बता दूं कि 10 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय हिन्दी दिवस मनाया जाता है। हिन्दी दिवस के मौके पर अगर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो एक आंकड़े के मुताबिक हिन्दी भारत में 77 फीसदी लोगों द्वारा बोली,समझी और लिखी जाती है! 

आंकड़े और माहौल बिल्कुल अलग! 

हैरान कर देने वाली बात तो ये है कि आंकड़े ये कहते है कि 77 फीसदी लोग हिन्दी का प्रयोग करते है और वहीं दूसरी तरफ अगर जमीनी हकीकत को तलाशने के बाद यह पता चलता है कि आने वाली पीढ़ियों में हम खुद ही इंग्लिश का बीज बो रहे है तो ऐसे में हिन्दी कहाँ है ? मसलन, अगर आप किसी ऐसे अभिभावक से बात करें, जो अपने बच्चे का स्कूल में दाखिला कराने वाले है! आप इनसे ये पूछिये कि क्या आप अपने बच्चे को हिन्दी माध्यम से पढ़ाएंगे? तो वो मुंह बिचकाते हुए कहेंगे ना रे बाबा, हिन्दी में क्या रखा है, आगे चलकर हमारा बच्चा कुछ नहीं बन पाएगा, हम इंग्लिश माध्यम से ही पढ़ाएंगे! खैर ये तो बात हो गई आने वाली पीढ़ी, लेकिन अब बात करते है वर्तमान पीढ़ी की। वर्तमान में तो ये हालत है कि हिन्दी माध्यम से पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी को हिन्दी मे गिनती नहीं आती है ! ये तो बस एक छोटा सा नमूना है, जमीनी हकीकत इससे भी ज्यादा है! 

बाजारवाद और हिन्दी.... 

 आज हिन्दी के स्तर का यूं गिरना इसका सबसे बड़ा कारण बाजारवाद है! बाजारवाद की ही ये देन है कि आज हिन्दी खुद के देश में ही पराई हो गई है! बाजरवाद ने जिस तरह से इंग्लिश को भारतीय बाजार में उतारा है, उससे तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले दिनों में शायद आंकड़े और भी कम हो जाये। आप सभी ने बाजार में इंग्लिश सिखाने वाले तमाम इंस्टीट्यूट तो देखा ही होगा, सिर्फ इंस्टीट्यूट ही नहीं वहाँ जाने वाले लोगों की लंबी चौड़ी भीड़ भी है। और हो भी क्यों न? जब वर्तमान समय मे इंग्लिश समझने, पढ़ने और बोलने से आपकी आमदनी ज्यादा होगी, तो आप खुद को उससे दूर कैसे रख पाएंगे!गजब की बात तो ये भी है कि अमेरिका की 45 विश्विद्यालय समेत विश्‍व के लगभग 175 विश्‍वविद्यालय ऐसे हैं, जहां पर हिंदी में पढ़ाई की जाती है, लेकिन शर्म की बात तो ये है कि हम भारतीय ही हिन्दी में पढ़ना,बोलना हीन समझते है! 
वक्त आ गया है कि हिन्दी को उसके ही घर मे पराई बनाने से अच्छा है कि उसको बिना किसी शर्म के अपनाएं, जब आप अपनाएंगे तभी तो हिन्दी खुद को पराई महसूस नहीं करेगी! गौर करने वाली बात तो ये है कि इंग्लिश के 26 वर्ण और हिन्दी के 52, फिर भी इंग्लिश हिन्दी पर भारी पड़ रही है, इसकी वजह सिर्फ बाजरवाद ही नहीं, बल्कि हम भी है, क्योंकि हम खुद हिन्दी बोलने से कतराते है और यही कारण है कि इंग्लिश हिन्दी पर लगातार हावी होती जा रही है!

7 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन पेशकश। आज हिंदी की ये स्थिति है कि किसी से शुद्ध हिंदी में बात कर लो तो लोगों को बेज्जती सी महसूस होने लगती है।

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    1. बिल्कुल सही कहा अभय ...मैंने देखा है कि जो क्षेत्रीय भाषा के लोग है ओ हिंदी को लेकर बेज्जती महसूस करते है उसे अपने क्षेत्रीय भाषा में ही अच्छा लगता है...कई बार आदमी हिंदी बोलने कि कोशिश करता भी है तो जो लोग उसे बोलते हुए देखते है उनका नजरिया ही अलग होता है...ज्यादा हिंदी पढ़ लिये हो या ज्यादा हिंदी ना झाड़ वैगैरा वैगरा...ये हालत होग गई है हिंदी की...!

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    2. बिल्कुल सही कहा अभय ...मैंने देखा है कि जो क्षेत्रीय भाषा के लोग है ओ हिंदी को लेकर बेज्जती महसूस करते है उसे अपने क्षेत्रीय भाषा में ही अच्छा लगता है...कई बार आदमी हिंदी बोलने कि कोशिश करता भी है तो जो लोग उसे बोलते हुए देखते है उनका नजरिया ही अलग होता है...ज्यादा हिंदी पढ़ लिये हो या ज्यादा हिंदी ना झाड़ वैगैरा वैगरा...ये हालत होग गई है हिंदी की...!

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    3. मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक स्टाफ से बात कर रहा था उनको मेरी शुद्ध हिंदी नहीं समझ आये तो बोलने लगे आप मुझसे बत्तमीजी कर रहें हैं। अब बताइये जब ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान के स्टाफ का ये हाल है तब हम कल्पना कर सकते हैं देश मे और जगह हिंदी की क्या स्थिति होगी।

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    4. धन्यवाद! वाकई अभय आपने बिल्कुल सही बात कही😊
      और नफ़्स आपने भी बिल्कुल सही बात कही,, यही सच्चाई है हमारे समाज की।

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  2. पिछले कई दिनों से हिंदी पर लिखे विभिन्न लेख पढ़ रहा हूं. आपका प्रयास सबसे प्रथक है. इसमें आधार है, जमीन है, व्यवहारिकता है, शिद्दत है और सबसे महत्त्वपूर्ण आंकड़ों का विशेष समायोजन! प्रखर लेखनी, प्रभावी लेखन !! ��

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