रविवार, 15 अक्टूबर 2017

बर्थडे स्पेशल: अखबार बेचते-बेचते कैसे बने भारत रत्न?

पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि देश के सर्वोच्च पुरस्कार से भी सम्मानित है। कलाम साहेब आज हमारे बीच में नहीं है, लेकिन फिर भी उनके होने का एहसास पूरे देश को है। 

15 अक्टूबर, 1931 को रामेश्वरम में जन्में कलाम तकदीर पर भरोसा न करके मेहनत पर भरोसा किया। यही कारण है कि आज कलाम देश के लिए प्रेरणा स्त्रोत है।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

जश्न-ए-दिवाली: साहेब हमारा क्या कसूर, जो सुनी कर दी दिवाली हमारी?

दिवाली को लेकर पूरे देश मे जश्न का माहौल हो गया है, लेकिन दिल्ली एनसीआर वालों के लिए ये दिवाली साइलेंट दिवाली हो सकती है! हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए इस साल दिल्ली एनसीआर में पटाखों पर बैन लगा दिया है!

 चलो ठीक है मान लिया जाए कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सही है! लेकिन सवाल उसके फैसले पर नहीं उठ रहे है बल्कि जिस समय ये फैसला लिया गया, वो वाकई कई लोगों के रोजी रोटी पर गहरा असर पड़ेगा! इतना ही नहीं करीब 200 करोड़ रुपये का भारी भरकम नुकसान भी हो सकता है!
 
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से पटाखा कारोबारियों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है! दिवाली के सीजन में पटाखों की बिक्री को देखते हुए कई ऐसे लोग भी होते हैं, जो दूर-दराज के क्षेत्रों से आकर दिल्ली में पटाखा बेचते है ताकि वो अपने बच्चों को दिवाली पर खुश कर सके! लेकिन अब क्या उनके बच्चों की दिवाली कैसे मनेगी? इन सवालों के बीच मे कई बड़े सवाल निकलते है, जिनमे से कुछ ऐसे है....

बड़े सवाल....
1.दिवाली के दस दिन पहले पटाखों पर बैन क्यों, अगर करना ही था तो एक महीने पहले होना चाहिए ताकि कोई भी विक्रेता पटाखा खरीदता ही नहीं!
2. अगर बैन लगाना ही था तो 1 नवम्बर तक ही क्यों, हमेशा के लिए क्यों नहीं?
3.प्रदूषण करने वाली हर चीज पर बैन कब? क्या अकेला पटाखों से ही प्रदूषण होता है? पान-गुटका-तम्बाकू-शराब आदि पर बैन कब? 
4.बैन करना ही था तो पूरे देश में क्यों नहीं? 
5. दिवाली से ठीक पहले पटाखों पर बैन लगाने से होने वाले नुकसान का भरपाई कौन करेगा? 
6.पटाखों से प्रदूषण होता है, इससे न तो कोर्ट अजनबी था और ना ही सरकार तो फिर क्यों सितंबर में लगने वाले बैन को हटा कर अब लगाया गया? 

आंकड़ों की बात करे तो दिल्ली-एनसीआर के पटाखा विक्रेताओं के पास लगभग 200 करोड़ का पटाखा फंस गया है। साथ ही आपको ये भी बता दूं कि नवभारत टाइम्स के वेबसाइट के अनुसार, दिल्ली में ही 50 से अधिक थोक और 300 से अधिक फुटकर पटाखा विक्रेता है। इसी तरह एनसीआर के शहरों में करीब 200 फुटकर पटाखा विक्रेता हैं।

इन्हीं तमाम सवालों से जूझ रहा है आज पटाखा बाजार। कई पटाखा विक्रेता तो ऐसे होते है, जो सिर्फ सीजनल मार्केटिंग करते है, ऐसे में ये उनके लिए किसी झटके से कम नहीं है! पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ पटाखों पर बैन लगाने की बात को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, पटाखा कारोबारियों ने याचिका दायर की थी लेकिन 13 अक्टूबर,2017 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि फैसले में किसी भी प्रकार का कोई संसोधन नहीं किया जाएगा! गौरतलब है कि दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर 1 नवम्बर तक बैन बरकरार रहेगा!
दिवाली के अगले दिन दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण का ग्राफ बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है, ऐसे में अगर पिछले साल की दिवाली की बात करे तो कई दिनों तक दिल्ली धुंधली -धुंधली ही थी, जिसकी वजह से दिल्ली निवासियों का सांस लेना भी मुश्किल हो गया था! यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए ये फैसला किया है! खैर, सुप्रीम कोर्ट का फैसला वाकई काबिले तारीफ है! लेकिन पटाखों पर बैन लगा है, तो जल्दी ही सुप्रीम कोर्ट को सरकारी दफ्तरों और गैर-सरकारी दफ्तरों में लगे वातानुकूलित को भी बैन करने पर विचार करना चाहिए क्योंकि वातानुकूलित से निकलने वाली गैस ओजोन को नुकसान पहुँचाती है!
खैर, मांजरा चाहे जो कुछ भी क्यों न हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को मजदूरों से उनकी रोजी रोटी नहीं छीननी चाहिए थी, बैन सही है, लेकिन बैन करने का समय बिल्कुल ही गलत है! आज दिल्ली एनसीआर के पटाखा विक्रेताओं का सवाल सुप्रीम कोर्ट से यही है कि आखिर क्या कसूर है उनका, जो उनकी दिवाली सुनी कर दी गयी? 

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

ये कैसा इंसाफ, न कातिल का पता न ही गुत्थी सुलझी?

आखिर क्या कसूर था आरुषि का, जिसकी वजह से उसे मौत के घाट उतारा गया था? कौन है आरुषि का कातिल? क्या कभी आरुषि के असली कातिल को कानून पकड़ पायेगा भी या नहीं? इन्हीं तमाम सवालों से आज भी जूझ रही होगी आरुषि की आत्मा!

 जी हाँ, 9 साल पहले, दिल्ली से सटे नोएडा में आरुषि का उसी के घर में बेदर्दी से हत्या कर दी गई थी! इस हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था!

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं...

राजनीति में आक्षेप-प्रतिआक्षेप बहुत सामान्य बात है. क्रिटिसिज़्म लोकतंत्र का मूल है, उसका आधातभूत गुण. वैसे तो बिना आलोचना के किसी भी क्षेत्र का निखार संभव ही नहीं जान पड़ता, पर बात यदि राजनीति की हो तो इसकी तो बुनियाद ही है.  असंतुष्टि और वैकल्पिकता !
 हर लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है. जो सरकार की नीतियों की सूक्ष्मातिसूक्ष्म और स्वस्थ आलोचना कर सके.

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: जहाँ चाह, राह वहाँ!

दीपकरोशनराधामनीष चलो बेटा चलोजल्दी करो। 'जी भैयाबस आये'। हर शाम तकरीबन बजे कुछ ऐसी ही आवाज गाजियाबाद जिले के प्रताप विहार कस्बे से आती सुनी जा सकती है। आप सोच रहे होंगे कि कहाँ चलने की बात हो रही है। जनाब ये तैयारी है जिंदगी में बहुत दूर तक जाने की।

 चलिए आपको विस्तार से समझाते हैं। ये आवाज हर शाम एक सामाजिक संस्था Light De Literacy’ के सदस्यों द्वारा लगाई जाती है।

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

विज्ञापन का नारीकरण या नारी का बाजारीकरण?

 विज्ञापनों की दुनिया जितनी ही खूबसूरत है, उतनी ही जटिल भी है। विज्ञापनों का इतिहास जितना रोचक है उतना ही उसे पनपने में कठिनाइयों का समाना करना पड़ा।

 वर्तमान युग में विज्ञापन के बिना बाजारवाद में उपनी साख जमाना किसी भी उत्पाद के लिए संभव नहीं है। उत्पादक अपने उत्पाद का प्रचार कैसे अर्थात किस माध्यम से और कहां करना है, इसकी रूपरेखा वो उत्पाद बनाने से पहले ही तय कर लेता है।

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: खबरें कहाँ है, आज खबर क्या है!

प्रश्न धड़ों में बंट चुके हैं, और जबाबदेही अय्याशियां कर रही है. देश बड़ा है. मुद्दे बड़े हैं. रोज एक सुबह होती है. रोज एक खबर आती है. पर देखने में आता है कि खबर खबर नहीं रहने पाती. उसके टुकड़े हो जाते हैं. विरोध, विरोध नहीं रह जाता. उसके रस्ते मुड़ जाते हैं.
 कभी किसी अति नीच अपराध के चलते अगर जनता अपनी दम पर कोई आंदोलन खड़ा भी करती है तो राजनैतिक दल उसका अधिग्रहण करने पहुँच जाते हैं.

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

एक अहिंसा का पुजारी तो दूसरा परमाणु अविष्कारक!

जरा सोचिये, वो कैसे नजारा होगा जब परमाणु अविष्कारक ने अहिंसा के पुजारी को पत्र लिखा था, ये तो वही बात हो गयी कि धरती और आसमान का एक हो जाना! अरे हैरान मत होइए, आप में से अधिकांश लोग तो शायद समझ ही गये होंगे कि मैं किसकी बात कर रही हूं? चलिये फिर भी आपको बताती हूँ!
जाने-माने वैज्ञानिक अलबर्ट आइंसटीन और महात्मा गांधी वैसे तो कभी एक दूसरे से मिले नहीं थे लेकिन दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान जरूर हुआ था! आसमान और धरती का मिलना जैसे असंभव है ठीक वैसे ही परमाणु के आविष्कारक और अहिंसा के पुजारी के बीच पत्राचार होना, थोड़ा तो खटक ही रहा है! 
1931 में अलबर्ट आइंसटीन ने गांधी जी के लिए पत्र लिखा! इस पत्र में आइंसटीन ने लिखा  था कि "अपने कारनामों से आपने बता दिया है कि हम अपने आदर्शों को हिंसा का सहारा लिए बिना भी हासिल कर सकते हैं! साथ ही हम हिंसावाद के समर्थकों को भी अहिंसक उपायों से जीत सकते हैं।

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: भाषा अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है!

अभिव्यक्ति के लिए भाषा का बहुत ज्यादा महत्व होता है। यह अभिव्यक्ति जनसामान्य की अस्मिता से लेकर देश के आगत भविष्य निर्माण के लिए भी हो सकती है। इसलिए भाषा का प्रश्न केवल भाषा तक ही सीमित नहीं होता है। यह यक्ष प्रश्न अंततः अपनी पहचान का प्रश्न है।


 आज भाषा की अभिव्यक्ति एवं पहचान दोनों ही प्रश्नों के घेरे में हैं। क्या जो हम सोचते हैं, उसे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाने में कितनी समर्थ हो रही है?

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

शास्त्री जयंती स्पेशल: सादगी और सच्चाई से ओतप्रोत, ऐसे थे भारत के दूसरे पीएम!

लाल बहादुर शास्त्री एक ऐसे व्यक्तिव है, जिनकी पहचान उनके नाम से बिल्कुल उलट है। जी हां, शास्त्री जी अपने नाम से बिल्कुल अलग-थलग है। उनके नाम यानी 'लाल' से आशय ये होता है कि गुस्से से लाल हो जाना, हमेशा क्रोधित होना, लेकिन शास्त्री जी ठीक इसके उलटे थे! सादगी और सच्चाई की मिसाल इस शख्स का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को यूपी के मुगलसराय में हुआ। शास्त्री जी के बारे में ढेर सारे अनकहे किस्से मौजूद है, जो शास्त्री जी के सादगी का उदाहरण देते है।
 
 कहा जाता है कि शास्त्री जी समय के पाबंद थे यानी घड़ी के सुइयों के अनुसार ही चलते थे!

गांधी जयंती स्पेशल: वो था बापू लाठी वाला....

 गांधी सिर्फ नाम ही नहीं है बल्कि शक्ति है! गांधी जी के शक्तियों का ही प्रभाव है कि आज भी पूरी दुनिया में उनका नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। जहाँ एक तरफ भारत में गांधी जी के जन्मदिन को गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है तो वहीं दूसरी तरफ सयुंक्त राष्ट्र संघ में 2007 से गांधी जयंती को 'विश्व अहिंसा दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

 गांधी जी के बारे में हम सभी सालों से पढ़ते या सुनते आ रहे हैं, लेकिन गांधी जी के बारे में जितना पढ़ो या सुनो उतना ही कम लगता है।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: साहब ये बहुत बड़ा धंधा है , इसे छोटा और आसान न समझो!

बार बार रास्ता निहारता हुआ और घड़ी की सुइयों को देखता हुआ मैं दोस्त के इंतजार में खड़ा था। कभी फोन करता तो कभी पसीना पोछता। शायद पहली बार ही ऐसा था कि मैं किसी मॉल के बाहर किसी का इंतजार कर रहा था, और करू ना भी तो क्यों? 

क्योंकि आखिरकार बहुत बातचीत करने के बाद मिलना तय हुआ था। अंदर से खुशी इतनी थी कि मैं बाहर ही इंतजार करने में आनंद लेने लगा था। कड़कड़ाती धूप से बचने के लिए मैं एक पेड़ की छांव में खड़ा हुआ था, तभी मेरी नजर, मुझसे दो कदम दूर बैठी एक महिला और उसके तीन बच्चों पर पड़ी।