विज्ञापनों की दुनिया जितनी ही खूबसूरत है, उतनी ही जटिल भी है। विज्ञापनों का इतिहास जितना रोचक है उतना ही उसे पनपने में कठिनाइयों का समाना करना पड़ा।
वर्तमान युग में विज्ञापन के बिना बाजारवाद में उपनी साख जमाना किसी भी उत्पाद के लिए संभव नहीं है। उत्पादक अपने उत्पाद का प्रचार कैसे अर्थात किस माध्यम से और कहां करना है, इसकी रूपरेखा वो उत्पाद बनाने से पहले ही तय कर लेता है।
विज्ञापन के स्वरूप पर अगर बात की जाए तो विज्ञापनों का स्वरूप भी सरल होने के साथ ही जटिलता से भरा हुआ है। विज्ञापन की दुनिया रोज नये आयाम को छूने में कामयाब हो रही है।
प्रिंट माध्यमों के रूप में तो विज्ञापनों ने तहलका मचा ही रखा है, लेकिन इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों के आने से तो जैसे विज्ञापन की सुंदरता में चार चांद लग गये। विज्ञापन को अगर पुस्तकों के नजरिये से देखा जाए तो उसका नजारा पूर्णत: सिद्धातों से भरा नजर आता है, वहीं दूसरी तरफ अगर उसके व्यवासायिक रूप पर चर्चा करे तो, विज्ञापन महज लाभ कमाने का जरिया है।
प्राचीन काल से ही विज्ञापन में नारी का प्रयोग आकर्षण के लिए किया जाता है। विज्ञापनों में नारीवाद का बढ़ता वर्चस्व ही, यह दर्शा देता है कि आज की नारी विभिन्न क्षेत्रों में तो आगे है ही, लेकिन आज विज्ञापन जैसे सशक्त माध्यम में भी अपनी साख जमाने में कमायाब हो रही है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विज्ञापन में नारी के जिस रूप को दिखाया जा रहा है, वो सराहनीय होने के साथ ही निंदनीय भी है। अब आप सोच रहे होंगे कि सराहनीय और निंदनीय एक साथ कैसे? तो आपको बता दूं कि हर सिक्के के दो पहलू होते है ठीक उसी तरह विज्ञापन में नारीवाद के भी दो पहलू है। सराहनीय इसलिए है, क्योंकि विज्ञापन के क्षेत्र में नारी का बढ़ता वर्चस्व आज की नारी को सशक्त बना रहा है! वहीं दूसरी तरफ़ निंदनीय इसलिये है क्योंकि विज्ञापन में नारी को एक वस्तु की तरह परोसा जा रहा है।
विज्ञापनों में नारीवाद का बोलबाला किसी से छुपा हुआ नहीं है। यही कारण है कि प्रोडक्ट चाहे कैसा भी क्यों न हो लेकिन ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए नारी की छवि का बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है। सवाल ये नहीं है कि आखिर विज्ञापनों में नारी ही क्यों? सवाल तो यहां पर ये खड़ा होता है कि विज्ञापनों में नारी को जिस तरह से परोसा जा रहा है, वो कहाँ तक मुनासिफ है? कपड़े,आभूषणों और गृहस्थी आदि के उत्पादों के विज्ञापनो में महिलाओं का होना तो ठीक है,,, लेकिन तंबाकू, गुटका हानिकारक उत्पादों में महिलाओं का क्या काम! जनाब बात यही नहीं थमती है; हद तो तब हो जाती है जब पुरुषों के उपयोग वाले उत्पादों का प्रचार प्रसार करने के लिए स्टार के रूप में महिला का चुनाव किया जाता है!
विज्ञापन में जिस तरह से नारी को परोसा जा रहा है, उससे एक बात तो साफ है कि आज विज्ञापन की दुनिया में नारी का बाजारीकरण किया जा रहा है! विज्ञापन में नारी की छवि पर जब दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ हरीश अरोड़ा से मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि "विज्ञापन में नारी को सिर्फ वस्तु की तरह परोसा जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ कोलकाता यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी से जब इस मुद्दे पर बात हुई तो उन्होंने दो टूक में कहा कि विज्ञापन की भाषा फुसलाने वाली है, और नारी की भाषा भी फुसलाने वाली है, यही कारण है कि आज विज्ञापन में नारी का बाजारीकरण किया जा रहा है!"
बात अगर महिलाओं के विज्ञापन की दुनिया मे कदम रखने तक ही सीमित होती तब भी ठीक होता, लेकिन उत्पादक अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए विज्ञापन के नाम पर नारी के जिस स्वरूप को परोस रहा है, वो कतई तारीफ के काबिल नहीं है!
(इस लेख में दिखाया गया चित्र का लेखक से कोई संबंध नहीं हैं | इसे इंटरनेट से केवल रेफेरेंस के लिए गया हैं |)
वर्तमान युग में विज्ञापन के बिना बाजारवाद में उपनी साख जमाना किसी भी उत्पाद के लिए संभव नहीं है। उत्पादक अपने उत्पाद का प्रचार कैसे अर्थात किस माध्यम से और कहां करना है, इसकी रूपरेखा वो उत्पाद बनाने से पहले ही तय कर लेता है।
विज्ञापन के स्वरूप पर अगर बात की जाए तो विज्ञापनों का स्वरूप भी सरल होने के साथ ही जटिलता से भरा हुआ है। विज्ञापन की दुनिया रोज नये आयाम को छूने में कामयाब हो रही है।
प्रिंट माध्यमों के रूप में तो विज्ञापनों ने तहलका मचा ही रखा है, लेकिन इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों के आने से तो जैसे विज्ञापन की सुंदरता में चार चांद लग गये। विज्ञापन को अगर पुस्तकों के नजरिये से देखा जाए तो उसका नजारा पूर्णत: सिद्धातों से भरा नजर आता है, वहीं दूसरी तरफ अगर उसके व्यवासायिक रूप पर चर्चा करे तो, विज्ञापन महज लाभ कमाने का जरिया है।
प्राचीन काल से ही विज्ञापन में नारी का प्रयोग आकर्षण के लिए किया जाता है। विज्ञापनों में नारीवाद का बढ़ता वर्चस्व ही, यह दर्शा देता है कि आज की नारी विभिन्न क्षेत्रों में तो आगे है ही, लेकिन आज विज्ञापन जैसे सशक्त माध्यम में भी अपनी साख जमाने में कमायाब हो रही है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विज्ञापन में नारी के जिस रूप को दिखाया जा रहा है, वो सराहनीय होने के साथ ही निंदनीय भी है। अब आप सोच रहे होंगे कि सराहनीय और निंदनीय एक साथ कैसे? तो आपको बता दूं कि हर सिक्के के दो पहलू होते है ठीक उसी तरह विज्ञापन में नारीवाद के भी दो पहलू है। सराहनीय इसलिए है, क्योंकि विज्ञापन के क्षेत्र में नारी का बढ़ता वर्चस्व आज की नारी को सशक्त बना रहा है! वहीं दूसरी तरफ़ निंदनीय इसलिये है क्योंकि विज्ञापन में नारी को एक वस्तु की तरह परोसा जा रहा है।
विज्ञापनों में नारीवाद का बोलबाला किसी से छुपा हुआ नहीं है। यही कारण है कि प्रोडक्ट चाहे कैसा भी क्यों न हो लेकिन ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए नारी की छवि का बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है। सवाल ये नहीं है कि आखिर विज्ञापनों में नारी ही क्यों? सवाल तो यहां पर ये खड़ा होता है कि विज्ञापनों में नारी को जिस तरह से परोसा जा रहा है, वो कहाँ तक मुनासिफ है? कपड़े,आभूषणों और गृहस्थी आदि के उत्पादों के विज्ञापनो में महिलाओं का होना तो ठीक है,,, लेकिन तंबाकू, गुटका हानिकारक उत्पादों में महिलाओं का क्या काम! जनाब बात यही नहीं थमती है; हद तो तब हो जाती है जब पुरुषों के उपयोग वाले उत्पादों का प्रचार प्रसार करने के लिए स्टार के रूप में महिला का चुनाव किया जाता है!
विज्ञापन में जिस तरह से नारी को परोसा जा रहा है, उससे एक बात तो साफ है कि आज विज्ञापन की दुनिया में नारी का बाजारीकरण किया जा रहा है! विज्ञापन में नारी की छवि पर जब दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ हरीश अरोड़ा से मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि "विज्ञापन में नारी को सिर्फ वस्तु की तरह परोसा जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ कोलकाता यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी से जब इस मुद्दे पर बात हुई तो उन्होंने दो टूक में कहा कि विज्ञापन की भाषा फुसलाने वाली है, और नारी की भाषा भी फुसलाने वाली है, यही कारण है कि आज विज्ञापन में नारी का बाजारीकरण किया जा रहा है!"
बात अगर महिलाओं के विज्ञापन की दुनिया मे कदम रखने तक ही सीमित होती तब भी ठीक होता, लेकिन उत्पादक अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए विज्ञापन के नाम पर नारी के जिस स्वरूप को परोस रहा है, वो कतई तारीफ के काबिल नहीं है!
(इस लेख में दिखाया गया चित्र का लेखक से कोई संबंध नहीं हैं | इसे इंटरनेट से केवल रेफेरेंस के लिए गया हैं |)

Jitna achha ish vishy ka shrishrk hai utna hi achha ish vishy ka tathy bhi hai.....
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार आपका विवेक!
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