रविवार, 1 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: साहब ये बहुत बड़ा धंधा है , इसे छोटा और आसान न समझो!

बार बार रास्ता निहारता हुआ और घड़ी की सुइयों को देखता हुआ मैं दोस्त के इंतजार में खड़ा था। कभी फोन करता तो कभी पसीना पोछता। शायद पहली बार ही ऐसा था कि मैं किसी मॉल के बाहर किसी का इंतजार कर रहा था, और करू ना भी तो क्यों? 

क्योंकि आखिरकार बहुत बातचीत करने के बाद मिलना तय हुआ था। अंदर से खुशी इतनी थी कि मैं बाहर ही इंतजार करने में आनंद लेने लगा था। कड़कड़ाती धूप से बचने के लिए मैं एक पेड़ की छांव में खड़ा हुआ था, तभी मेरी नजर, मुझसे दो कदम दूर बैठी एक महिला और उसके तीन बच्चों पर पड़ी।
महिला की गोदी में उसका सबसे छोटा बच्चा लेटा हुआ था और बाकी दोनों बच्चे अपने काम को काम कम और खेल ज्यादा समझ रहे थे, जिसपे महिला कभी गुस्सा हो रही थी तो कभी गालियां दे रही थी तो कभी मारने के लिए दौड़ाने का निरर्थक प्रयास कर रही थी। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर काम क्या था उनका ? अरे भईया, उनका काम बस इतना था कि आने और जाने वाले लोगों के पास जाकर एक हाथ खुद के पेट पर फेरते हुए इशारों में ये बताना कि बहुत भूख लगी है और दूसरे हाथ से एक टोकरी लोगों के आगे करना जिसमें वो कुछ सिक्कों के रूप में दया डाल सकें।

आप लोग भी इन लोगों से कभी न कभी तो रूबरू हुए ही होंगे! इनके काम करने का अंदाज भी कुछ अलग ही है, वो ये है कि ये लोग सिर्फ लेते ही नहीं थे बल्कि बदले में मन-लुभावन कामना भी करते थे जैसे प्रेमी जोड़ो को देखकर उनके शादी की भविष्यवाणी, शादीशुदा नए जोड़ो को देखकर उनके बच्चे होने की भविष्यवाणी , बिजनेसमैन को देखकर उनके बिजनेस में खूब वृद्धि होने की भविष्यवाणी इत्यादि। गजब का जज्बा और जोश लिए हुए ये लोग अपना काम करते हैं, कई लोग इन पर तरस खाकर कुछ सिक्के कटोरी में डाल देते है तो अधिकतर लोग दुत्कार कर भगा देते थे, लेकिन इन लोगों के बीच में कुछ ऐसे लोग थे जो ऐसा रिएक्शन देते थे जैसे उनसे कोई कुछ बोल ही न हो।



अभी तक तो सब नार्मल ही था, सबके साथ ऐसा ही होता होगा कभी न कभी, लेकिन इन सबके बीच मुद्दे की बात तो तब सामने आई जब दिखने में एक सरकारी अफसर अपने किसी मित्र के साथ आये और बच्चे अपने ट्रेनिंग के अनुसार उनके पास भी गए। पहले तो महाशय ने बच्चें को खूब जोर से डाँटा और फिर सेक्युरिटी गॉर्ड रूम की ओर देखते हुए कुछ कानूनी भाषा मे सवाल दागे जैसे इन्हें जेल में क्यों नही डलवाते, यहा से भगाते क्यों नहीं? लेकिन गार्डों के कान पर जूं तक नहीं रेंगा।

इधर मेरे इंतजार का सब्र धीरे-धीरे टूटता ही जा रहा था, तभी मैंने इतना सबकुछ देखने के बाद आंटी जी से बोला कि आप कोईं काम धंधा क्यों नही करती हैं ? मैं यही नहीं रुका आगे मैंने आंटी जी को नसीहत देते हुए कहा कि अगर झाड़ू पोछा भी कर लेंगी किसी के घर में तो भी आप शान से जी पाएंगी और बच्चों की परवरिश भी अच्छे से कर पाएंगी। यहां तक भी सब ठीक था, लेकिन जब उन्होंने मेरे सवालों का जवाब दिया तो भईया मैं तो स्तब्ध रह गया। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या कह दिया कि मैं हैरान हो गया तो चलिये आपको बताता हूँ कि उन्होंने क्या जवाब दिया?


 मेरे सवालों पर दो टूक में जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि  ‘साहब ये बहुत बड़ा धंधा  है , इसे छोटा और आसान न समझो, सबसे  बड़ा धंधा है ये।’ इतने में ही  उनके लंच का टाइम हो गया था और ये कहते हुए वो अपने बच्चों के साथ लंच करने निकल गयीं। इस वाक्या से जब तक मैं खुद को बाहर निकाल पाता तब तक मेरे दोस्त का आगमन हो चुका था, जिसके साथ मैं अंदर  मॉल में चला गया। तब से लेकर आज तक जब कभी मैं कहीं पर भी ऐसे बच्चों, महिलाओ या पुरुषों को देखता हूँ तो मुझे महिला की वही लाइन याद आ जाती है कि “साहब सबसे बड़ा धंधा है ये सबसे बड़ा।”

लेखक- कुँवर विभोर सिंह (kuvarvibhor@gmail.com)
आपको जान के खुशी होगी कि अब 'श्रेया की कलम से', युवा आवाजों को भी जगह दे रही है। अगर आप भी किसी मुद्दे पर अपनी आवाज को बुलंद करना चाहते हैं तो भेजिये मुझे, आपके लेख को आपके नाम से प्रकाशित किया जाएगा। स्वरचित लेख आप इस पते पर भेज सकते हैं- aboutshreyapandey@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें