अभिव्यक्ति के लिए भाषा का बहुत ज्यादा महत्व होता है। यह अभिव्यक्ति
जनसामान्य की अस्मिता से लेकर देश के आगत भविष्य निर्माण के लिए भी हो सकती
है। इसलिए भाषा का प्रश्न केवल भाषा तक ही सीमित नहीं होता है। यह यक्ष
प्रश्न अंततः अपनी पहचान का प्रश्न है।
आज भाषा की अभिव्यक्ति एवं पहचान दोनों ही प्रश्नों के घेरे में हैं। क्या जो हम सोचते हैं, उसे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाने में कितनी समर्थ हो रही है?
हमको शायद ये ज्ञात नही रहा कि हमने अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई हिंदी माध्यम से जीती है। हिंदी की ऊर्जा का एकमात्र स्त्रोत साधारण मनुष्य ही है। जनसामान्य ही भाषा की राष्ट्रीय गरिमा को प्रतिष्ठित एवं कायम रखता है। वही भाषा की निजता को सुरक्षित एवं संरक्षित रखता है, परंतु भूमंडलीयकरण के वर्तमान दौर में हिंदी भाषा के विकास के पैमाने पर कई प्रश्नचिन्ह लग गए हैं।
आज भाषा की अभिव्यक्ति एवं पहचान दोनों ही प्रश्नों के घेरे में हैं। क्या जो हम सोचते हैं, उसे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाने में कितनी समर्थ हो रही है?
हमको शायद ये ज्ञात नही रहा कि हमने अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई हिंदी माध्यम से जीती है। हिंदी की ऊर्जा का एकमात्र स्त्रोत साधारण मनुष्य ही है। जनसामान्य ही भाषा की राष्ट्रीय गरिमा को प्रतिष्ठित एवं कायम रखता है। वही भाषा की निजता को सुरक्षित एवं संरक्षित रखता है, परंतु भूमंडलीयकरण के वर्तमान दौर में हिंदी भाषा के विकास के पैमाने पर कई प्रश्नचिन्ह लग गए हैं।
संसार भर में बोली जाने वाली जीवित भाषाओं की संख्या लगभग
6912 है, जिनमें लुप्तप्राय भाषाओं की संख्या लगभग 516 है। अकेले भारत में
लगभग 1652 भाषाएँ बोली जाती हैं। इनमें से अधिकांश आदिवासी भाषाएँ लुप्त
होने की कगार पर हैं।यूनिसेफ की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2100
तक दुनिया की लगभग 6000 भाषाएँ खत्म हो जाएंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि
किसी भाषा के खत्म होने का अर्थ है उस भाषाभाषी समुदाय की, समाज की
सांस्कृतिक चेतना, रीति-रिवाज, स्थानीय विशिष्टताओं, अस्तित्व और अस्मिता
का समाप्त होना। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डेविड क्रिस्टल ने अपनी कृति
'लैंग्वेज डेथ' में लिखा है कि भाषा की मृत्यु और मनुष्य की मृत्यु लगभग एक
सी घटना है; क्योंकि दोनों का अस्तित्व एकदूसरे के बिना असंभव है। निज
भाषा के बिना भावनाओं की अभिव्यक्ति को गरमाहट नहीं प्रदान की जा सकती।
आज भाषाएँ और बोलियाँ जिस द्रुतगति से हमारे जीवन से दूर
होती जा रही हैं, उसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले
दिनों में नई पीढ़ी के पास मात्र तकनीकी भाषा होगी। आज विश्व भर में कुल आठ
भाषाओं का राज है। अँग्रेजी, बँगला, हिंदी, चीनी, स्पेनिश, पुर्तगाली, रूसी
और जापानी भाषा बोलने वालों की संख्या लगभग ढाई करोड़ है, जिसमें से
अँग्रेजी और हिंदी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाएँ हैं।
भाषा का निर्माण टकसाल में न होकर सड़क पर होता है,
चौपाल में होता है, गाँव के गलियारों में होता है और उसका शिल्पी देश का
आमजन है। भाषा की समृद्धि एवं संपन्नता जन-जन की भाषा के प्रति सजगता,
सक्रियता एवं जागरुकता पर निर्भर करती है। भाषा के विनाश एवं विकास में वही
एकमात्र जिम्मेदार होता है। आज यह जिम्मेदारी खतरे में पड़ी दृष्टिगत हो
रही है।
यदि हम थोड़ा इतिहास के पन्ने पर की धूल साफ करके देखें
तस्वीरें कुछ अलग मिलेगी, मध्यकाल में मुगलों ने हमारी मातृभाषा हिंदी के
साथ अन्य भाषाओं का गठबंधन, संयोग-समन्वय किया। इस कारण हिंदी भाषा का
विभाजन नही हुआ, बल्कि उसकी विविधता में विकास ही हुआ। हिंदी में उर्दू और
फारसी आदि भाषाओं का सुंदर गठजोड़ हुआ। भाषा के आयामों में विकसित हुई।
विकास के इन मूल कारणों को अंग्रेजों की अंग्रेजी ने चोट मारी और इसे कमजोर
कर हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी को प्रतिष्ठित बनाने का कुचक्र रचा गया।
बहुत हद तक यह कुचक्र सफल हुआ, जिसका परिणाम हमारे सामने है कि हम हिंदी से
अधिक अंग्रेजी भाषा बोलने में गर्व अनुभव करते हैं। चाँदी के चंद सिक्कों
में हम अपनी पहचान खोने लगे हैं। अगर ऐसा नहीं है तो क्या कारण है कि हमें
अपनी हिंदी एवं अन्य मातृभाषा बोलने में संकोच होता है। ऐसा संकोच तो चीनी,
रूसी, जर्मन एवं फ्रांस के लोग नही करते, वे तो अपनी ही भाषा को
प्राथमिकता देते है।
आज हिंदी की नियति एवं परिस्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
भाषा का निर्माण जनसामान्य करते हैं, अन्ततः इसकी रक्षा वही करेंगे,
क्योंकि सरकार, आयोग और आयोजन न भाषा का निर्माण करते हैं और न
परिष्कार-परिमार्जन। हिंदी भाषा का उत्थान भी इन्हीं जनसामान्य के हाथों
में है। अतः जनसामान्य की जागरूकता आवश्यक है। भारतीय भाषा अपनी प्रगतिशील
परंपराओं का विकास करे और दूसरी भारतीय भाषाओं तथा विश्व की विकसित भाषाओं
के साथ जातीय संवाद द्वारा संसार से अपेक्षित प्रतिष्ठा एवं समृद्ध उपलब्ध
करे।
इस संदर्भ में हिंदी साहित्य के शिरोमणि मुंशी प्रेमचंद के शब्द हैं - "राष्ट्र की बुनियाद राष्ट्र की भाषा है। नदी, पहाड़ और
समुद्र राष्ट्र नहीं बनाते। भाषा ही वह बंधन है, जो चिरकाल तक राष्ट्र को
एक सूत्र में बाँधे रहती है और इसे बिखरने, विखण्डित एवं विभाजित होने से
रोकती है।" अतः हमारी मौलिकता एवं निजता की अभिव्यक्ति हमारी भाषा में
निहित होती है, इसका ध्यान रखना चाहिए।
लेखक: आदर्श शुक्ला (adarshshukla602273@gmail.com)
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