सोमवार, 4 सितंबर 2017

मजदूरी वही, अंदाज नया!

भारत के इतिहास पर गौर किया जाए तो बंधुआ मजदूरी का लंबा-चौड़ा इतिहास देखने को मिलता है। प्राचीन समय मे जमीदार बंधुआ मजदूरी करवाते थे, और अब पूंजीपतियों द्वारा इसको नया रूप दे दिया है। जी हाँ, मैं आपका नये नाम से परिचय करवाती हूँ, ये नया नाम है- हिंदी में नौकरी और अंग्रेजी में जॉब! आप सभी इस नाम से भलीभांति परिचित ही हैं, इसलिए इसका विवरण करने की कोई जरूरत नहीं है! खैर ये फिजूल की बात छोड़कर मुद्दे की बात करते है!


हां तो मैं बात कर रही हूं मजदूरी की! बंधुआ मजदूरी को समझना है तो कलर्स पर 'उड़ान' नामक कार्यक्रम का संचालन होता है, उसके शुरू के एपिसोड देखेंगे तो आपको बंधुआ मजदूरी का अर्थ समझ आ जायेगा!
बंधुआ मजदूरी की बात करे तो इसका सीधा सा अर्थ है कि आपके मालिक ने आपको खरीद लिया है, आप उसके मर्जी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिला सकते है! ठीक ऐसा ही पेशा है नौकरी, इस पेशे में आप अपने प्रिंसीपल को भुलाकर अपने बॉस के आईडिया को अपनाते है तो आप से बेहतर कोई नहीं, लेकिन जहां आपने अपना दिमाग लगाया वही आपकी खैर नहीं!  दरअसल, मजदूरी के इस नए आयाम को समझता तो हर कोई है, लेकिन इसका विरोध नहीं कर पाता है क्योंकि उसी से उसकी रोजी-रोटी चलती है, ऐसे में वो अपने पेट पर लात नहीं मार सकता है!

बंधुआ मजदूरी और नया मजदूरी...

बंधुआ मजदूरी में ये होता था कि आप ताउम्र किसी एक मालिक के लिए काम करते थे, उस समय आपके पास विकल्प नहीं थे! इसके विपरीत नया मजदूरी या जॉब में आपके पास ऑप्शन भरमार होते है कि आप एक मालिक को छोड़कर दूसरे मालिक का दामन थाम सकते है! ये तो रहे दोनों मजदूरी में अंतर! अब बात करते है दोनों के बीच समानताओं की....

दोनों में एक समान चीज है कि मालिक ने आपको कुछ रकम देकर आपके दिल,दिमाग और आपकी बॉडी को खरीद लिया है, यानी आप उसके गुलाम है! अगर वो दिन कहे तो आपको भी दिन ही कहना होगा!

गुलामी का हद तो तब पार हो जाती है कि जब आप निर्धारित समय पर अपने ऑफिस पहुँचे और काम भी करें लेकिन आपके मालिक द्वारा आपको यह कहा जाए कि समय पर आने की बात तो बहुत अच्छी है लेकिन टाइम पर जाने की बात बहुत गलत है! हद हो गई गुलामी की, ये कारपोरेट वाले आपको रोज नए-नए बंधन में बांधते है, लेकिन आप लोग चाह कर भी इसका विरोध नहीं कर पाते है!


नये मजदूरी पर बड़े सवाल और व्यंग्य....


शुरुआत अगर शुरू से की जाए तो मुद्दा चमकने लगता है, इसलिए मैं भी शुरू से ही शुरुआत करती हूं! एक उदाहरण देती हूं, जोकि आप सभी के लाइफ में एक न एक दिन जरूर आया होगा या फिर आने वाले दौर में आप लोग इस दिन से गुजरेंगे! मसलन के तौर पर, आप जॉब यानी मजदूरी करने के लिए किसी ऑफिस में जाएंगे, तो वहाँ आपका अच्छे से इंटरव्यू लिया जाएगा, इंटरव्यू के दौरान आपके काम करने घण्टे और आपका वेतन निर्धारित किया जाता है! उस समय जो आपका इंटरव्यू ले रहा होगा, जो कुछ ही देर में आपका मालिक बन जायेगा या यूं कहें कि आप उसके गुलाम बन जाएंगे, वो बड़ी ही चालाकी से आपसे कुछ बाते छुपा लेगा! अरे हां, ये वही बात होती है, जिसमें बंधुआ मजदूरी की झलक देखने को मिलती है। आपकी जॉइनिंग हो जाती है, पहले दिन आपको बिल्कुल सहज फील कराया जाएगा, फिर उसके बाद जैसे-जैसे दिन बीतते जाएंगे वैसे-वैसे आपकी   गुलामीकरण बढोत्तरी होती जाएगी! आप समझ नहीं पाएंगे कि कब आपके बॉस ने आप पर पूरा कब्जा जमा लिया है! फिर एक वक्त आएगा कि आप अपना काम खत्म कर लेंगे, उसके बाद आपका बॉस आकर कहेगा कि ऑफिस आने का समय तय होता है और जाने का समय हम तय करते है! हद ही हो गई ये बात तो आपने इंटरव्यू के समय मे नहीं कही थी! तो भईया यही से शुरुआत होती है आपके गुलामीकरण का सिलसिला! इस मामलें में एक बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि क्या बॉस के पास वेतन देकर आपको खरीदने का अधिकार है, जो वो जैसे चाहे आपका इस्तेमाल कर सकता है? चलिये ठीक है, मान लिया जाए कि वो आपको आपके काम की राशि अदा करता है, लेकिन भईया इसका ये मतलब तो न हुआ न कि आप उसके गुलाम है! तो डिअर बॉस, अगर आप ये समझते है कि आप से ऊपर या आप से बड़ा कोई नहीं है या फिर अगर आप यह सोचते है कि आपका पूरा कब्जा है आपके कर्मचारी पर, तो महोदय भूल जाइये अगर कर्मचारी न हो तो बाजार में भी आपकी कोई साख नहीं है, अरे साख का मतलब नहीं समझे वही साख जिसपे गुरुर कर आप कर्मचारियों को अपना गुलाम समझते है!

(नोट-ये लेख किसी की भावनाओ को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है और न ही यह सभी बॉस और मालिकों के लिए है! टिप्पणी के लिए आप सादर आमंत्रित है!)

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