बुधवार, 27 सितंबर 2017

जब महिलाएं ही स्वस्थ नहीं होंगी तो देश कैसे विकास करेगा?

 आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बुनियादी मुद्दे किसी कोने में दबते जा रहे हैं, और हमारे देश की मीडिया नेताओं और कलाकारों के पीछे भगाती रहती है। मीडिया इस पर ज्यादा ध्यान देता है कि आज किस पार्टी के नेता ने किस पार्टी के नेता पर तंज कसा है या फिर आज कौन सा कलाकार किस कलाकार के साथ डेट पर गया या फिर किसका ब्रेकअप हुआ! इन सबके के बीच मे बुनियादी मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं! बुनियादी मुद्दों से जुड़ा हुआ एक मामला ये भी है कि महिलाओं में कुपोषण का प्रभाव ज्यादा है। ऐसे में ढेर सारे सवाल खड़े होते हैं, जिनमें से एक ये है कि जब देश की महिलाएं ही स्वस्थ नहीं होंगी तो देश कैसे विकास करेगा ?


 देश के विकास में महिलाओं के योगदान से तो शायद ही कोई बेखबर होगा क्योंकि हम सभी जानते है कि देश का भविष्य बच्चे होते हैं,
ऐसे में जब माँ ही स्वस्थ नहीं होगी तो बच्चा कैसे स्वस्थ हो सकता है और फिर जब बच्चा ही स्वस्थ नहीं होगा तो वो देश के विकास में अपना योगदान कैसे कर सकता है? आप सभी जानते है कि मां की स्वस्थता पर ही बच्चे की स्वस्थता निर्भर करती है। लेकिन अफसोस है कि आज भी हमारा देश कुपोषण जैसी बीमारियों से जूझ रहा है!

 नेशनल फैमिली हेल्थ 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, देश के सबसे बड़े राज्य यानी यूपी में लगभग ढाई करोड़ महिलाएं कुपोषण से ग्रसित है! पूरे देश में कुपोषण से ग्रसित महिलाओं की संख्यां 9 करोड़ है, जोकि अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा है! इतना ही नहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और असम की एक चौथाई महिलाओं का शारीरिक रूप से विकास नहीं हुआ है। शारीरिक रूप से विकास से आशय ये है कि इन प्रदेशों की एक चौथाई महिलाओं की न तो मानक रुप से लंबाई है और न ही मानक रूप से इनका वजन है! ऐसे में यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता कि आजादी के इतने सालों बाद भी हमारी सरकारों ने इस पर गम्भीर रूप से ध्यान क्यों नहीं दिया? हालांकि विकासशील देशों की यही सबसे बड़ी समस्या होती है लेकिन बाकी विकासशील देशों के मुताबिक ये आंकड़ा भारत में ज्यादा है! 

नेशनल हेल्थ फैमिली की रिपोर्ट पर अगर आगे गौर किया जाए तो कुपोषण से प्रभावित लगभग 4500 महिलाओं की हर साल प्रसव के समय मौत हो जाती है। साथ ही आकड़ो की बात करे तो भारत में हर तीन में से एक महिला एनीमिया की शिकार है, और तो और देश की 51 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है!
 आजादी के इतने सालों बाद भी हम कुपोषण को अपने घर से खदेड़ नहीं पाएं, ये हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है। हम लाख तरक्की कर लें लेकिन तब तक हम सही मायने में सफल नहीं हो पाएंगे जब तक देश की महिलाएं कुपोषण से ग्रसित रहेंगी!
 लोकतंत्र का चौथा खंभा मीडिया भी इस मुद्दे पर डिबेट नहीं कराती फिरती हैं, उसे तो बस टीआरपी की आड़ में ग्लैमर को बेचना होता हैं, ऐसे में उसे बुनियादी मुद्दे कैसे दिखाई देगा? हमारी सरकार भी इस मुद्दे को गम्भीरता से नहीं लेती है, उसे तो बस ये ध्यान रहता है कि अब आने वाला चुनाव किस प्रदेश में है, वहाँ जाकर जनता को लुभाना ध्यान रहता है! तो ऐसे में इन मुद्दों पर उसका ध्यान जाए तो भी कैसे?
 अगर सरकार देश को तरक्की की राह पर ले जाना चाहती है तो उसे आंकड़ों पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन सिर्फ ध्यान देने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार को इसके उचित और ठोस कदम उठाने चाहिए ताकि देश की महिलाएं स्वस्थ हो सके और आने वाली पीढ़ी देश के विकास में योगदान दें सके! सरकार को चाहिए कि इस बुनियादी मुद्दे के लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाए ताकि महिलाएं खुद को स्वस्थ रख सकें, जरूरी पोषण के ज्ञान के अभाव में भी ज्यादातर महिलाएं कुपोषण की शिकार हो जाती है तो कुक महिलाएं गरीबी की वजह से कुपोषित हो जाती हैं! ऐसे में देश से गरीबी और कुपोषण दोनों को खदेड़ देना चाहिए ताकि हमारा देश विश्वभर में तरक्की करे! 
"देश मेरा उस दिन तरक्की करेगा, जिस दिन देश की महिलाएं स्वस्थ होंगी"

1 टिप्पणी:

  1. सुधारवादी लेख....!! आगामी पीढ़ी के भविष्य का भयानक संकेत!! ऐसे कोई सवाल प्रातःकालीन सूर्य के दर्शन कर रहे है यूँ कहे दिन प्रतिदिन अनेकों प्रकार के बुनियादी सवालों का नामकरण हो रहा है परन्तु बुद्धिजीवी वर्ग का जवाब निद्रासन की मुद्रा का त्याग ही नही करना चाहता, ब्रह्ममुहूर्त क्या होता है? इसका ज्ञान अभी हुआ ही नही।

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