दीपक, रोशन, राधा, मनीष चलो बेटा चलो, जल्दी करो। 'जी भैया, बस आये'। हर शाम तकरीबन 4 बजे
कुछ ऐसी ही आवाज गाजियाबाद जिले के प्रताप विहार कस्बे से आती सुनी जा
सकती है। आप सोच रहे होंगे कि कहाँ चलने की बात हो रही है। जनाब ये तैयारी
है जिंदगी में बहुत दूर तक जाने की।
चलिए आपको विस्तार से समझाते हैं। ये
आवाज हर शाम एक सामाजिक संस्था ‘Light De Literacy’ के
सदस्यों द्वारा लगाई जाती है।
यह संस्था झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करती है। ये वे बच्चे होते हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी मिलेगी या नहीं, ये भी निश्चित नहीं होता हैं। इन्हें देखकर बहुत सारे प्रश्न मन में आते हैं। प्रश्न आते हैं क्या राधा बड़ी होकर अपनी माँ की तरह ससुराल में दूसरों के घर जाकर झाड़ू पोंछा ही करेगी? क्या मनीष बड़ा होकर अपने पापा की तरह ही रिक्शा खींचेगा?क्या सुजीत बड़ा होकर अपने पापा की जूते सिलने की दुकान सम्भालेगा? जी हाँ, ऐसे कई प्रश्न आपके मन में भी आ रहें होंगे। आप भी कभी इन्हें करीब से जानने की कोशिश करें। सरकारी नजरिये से देखें तो इस प्रश्न के उत्तर के रूप में बहुत से नियम कानून दिख जायेंगे। लेकिन जमीनी तौर पर ये नियम कानून इनके साथ एक मजाक के अलावा और कुछ नहीं हैं।
यह संस्था झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करती है। ये वे बच्चे होते हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी मिलेगी या नहीं, ये भी निश्चित नहीं होता हैं। इन्हें देखकर बहुत सारे प्रश्न मन में आते हैं। प्रश्न आते हैं क्या राधा बड़ी होकर अपनी माँ की तरह ससुराल में दूसरों के घर जाकर झाड़ू पोंछा ही करेगी? क्या मनीष बड़ा होकर अपने पापा की तरह ही रिक्शा खींचेगा?क्या सुजीत बड़ा होकर अपने पापा की जूते सिलने की दुकान सम्भालेगा? जी हाँ, ऐसे कई प्रश्न आपके मन में भी आ रहें होंगे। आप भी कभी इन्हें करीब से जानने की कोशिश करें। सरकारी नजरिये से देखें तो इस प्रश्न के उत्तर के रूप में बहुत से नियम कानून दिख जायेंगे। लेकिन जमीनी तौर पर ये नियम कानून इनके साथ एक मजाक के अलावा और कुछ नहीं हैं।
आज से 5 साल पहले कुछ ऐसे ही प्रश्न ABES ENGINEERING COLLEGE के छात्र शुभम रुंगटा,समीक्षा, श्रीवास्तवा, रोहित
और इनके अन्य साथियों के मन में आयी होगी। लेकिन इन्होंने इन प्रश्नों को
चट्टी- चौराहों, चाय की दुकानों पर चर्चा का विषय नही बनाया बल्कि इस
समस्या का समाधान के लिए, अंधकार में डूबे मासूमों के भविष्य को शिक्षा का
प्रकाशित करने की ठानी। इन शभी का कहना है कि शिक्षा ही एक साधन है जिससे
समाज की तमाम बुराईयों; जैसे-गरीबी, घूसखोरी, बेरोजगारी
पर काबू पाया जा सकता है। लेकिन इन्हें शिक्षित करना भी आसान काम नहीं।
क्योंकि बच्चों के अभिभावक जीवन यापन के लिए जो भी काम कराते हैं उन में
बच्चों को लगाये रहते हैं। ऐसा करने के पीछे मकसद ये नहीं ये नहीं होता कि
इनका बचपन छीन लिया जाये। ऐसा करने का पीछे मंसा होती है इनके भविष्य को
सुरक्षित करने की। मकसद होता है इन्हें अपने पुस्तैनी कामो से रू-बरू कराना
ताकि ये बड़े होकर अपने रोजी- रोटी की व्यवस्था कर सकें।
जब
हम ऐसे कामों के लिए जमीन पर जाते हैं, सबसे बड़ी समस्या होती है इनके
अभिभावकों को समझाना और फिर इनके मन मे पढ़ाई के लिए ललक पैदा करना, यही
सबसे मुश्किल काम होता है। लेकिन जहाँ समस्या वहीं से समाधान भी निकाने की
कोशिश करते हैं। हमारे टीम के मेहनत का नतीजा है कि आज गाजियाबाद, नोएडा, बहराइच, और अजमेर, गोरखपुर जैसे बड़े शहरों समेत पूरे भारत में 15 लिटरेसी सेंटर हैं। जिसके द्वारा प्रतिदिन 1300 से अधिक गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है। वर्तमान में 1000 से अधिक सदस्य संस्था जुड़े हुए हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि संस्था के सभी सदस्य युवा विद्यार्थी हैं। आज से कुछ समय पहले जिन बच्चों के कल का भरोसा नहीं था वे आज जवाहर नवोदय जैसे राष्ट्रीय विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। आज यह संभव हो पाया है तो ‘सिर्फ और सिर्फ' कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय से।
✍ लेखक- कुँवर विभोर सिंह (kuvarvibhor@gmail.com)
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जान के खुशी होगी कि अब 'श्रेया की कलम से', युवा आवाजों को भी जगह दे रही
है। अगर आप भी किसी मुद्दे पर अपनी आवाज को बुलंद करना चाहते हैं तो
भेजिये मुझे, आपके लेख को आपके नाम से प्रकाशित किया जाएगा। स्वरचित लेख आप
इस पते पर भेज सकते हैं- aboutshreyapandey@gmail.com।



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