बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

#युवा कलम-युवा आवाज: प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं...

राजनीति में आक्षेप-प्रतिआक्षेप बहुत सामान्य बात है. क्रिटिसिज़्म लोकतंत्र का मूल है, उसका आधातभूत गुण. वैसे तो बिना आलोचना के किसी भी क्षेत्र का निखार संभव ही नहीं जान पड़ता, पर बात यदि राजनीति की हो तो इसकी तो बुनियाद ही है.  असंतुष्टि और वैकल्पिकता !
 हर लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है. जो सरकार की नीतियों की सूक्ष्मातिसूक्ष्म और स्वस्थ आलोचना कर सके.
बल्कि आदर्श स्थिति तो ये कहती है कि आत्मालोचन होना चाहिए. आत्मविश्लेषण में पगा व्यक्तित्व सबसे अधिक परिष्कृत होता है. पर यदि हमारे लोकतंत्र को एक सरसरी निगाह से देखा जाए तो विकल्प बहुत सीमित नजर आते हैं और पूरी राजसत्ता गिने चुने कुनबों में ही सिमटी दिखाई पड़ती है. यही कारण है कि राजशाही हाथ लगते ही राजघरानों में आत्ममुग्धता के लक्षण परिलक्षित होने लगते हैं. हालांकि इसकी अति कभी नहीं होने पाई और समय समय पर विकल्प उभरते रहे हैं. कभी जनांदोलनों के रूप में तो कभी क्षेत्रीय दलों के रूप में. जिन्होंने बेकाबू होती गाड़ी को पटरी पर बनाये रखा है. और आज भी हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र बने हुए हैं. ये अच्छी बात है.




इसमें कोई दो-राय नहीं कि तमाम कायदे कानूनों और विपक्ष के संसद में मौजूद होने के बाबजूद प्रजातंत्र में बड़ा दल पूरी सत्ता अपने मुताबिक चलाता है और अधिकतर निर्णय वो अपनी निजी सोच और बौद्धिकता से लेता है. सहयोगी उसके विचारों को पुष्ट कर सकते हैं, सुझाव दे सकते हैं पर मूल भावना स्थायी रहती है. और इसीलिये किसी नीति विशेष को फलां फलां सरकार की नीति कहा जाता है. वह इनके प्रति सीधा सीधा उत्तरदायी होती है. सरकार को अपने अनुसार नीतियां निर्धारित करने का हक है, और वह चुनी भी इसीलिए जाती है. अपनी नीतियों के लिए, अपनी योजनायों के लिए. पर इसका ये कतई मतलब नहीं होता कि वह वाद-संवाद, परिचर्चा, सुझाव आदि को धता बताने लगे और उनकी उलाहना करने लगे. बहुमत के मद में लोकहित को दबा दे और अप्रत्यक्ष तानाशाही कायम कर ले जाए. ऐसे शब्द मैं इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि आजकल ऐसा ही कुछ देखने मे आ रहा है. एक के बाद एक सरकार ने ऐसे निर्णय लिए है जो लोगों की सामूहिक परेशानी का सबब बने हैं. उपेक्षा, असुविधा, अव्यवस्था और तबाही. देशभक्ती और विकास को बीच आंगन में दूल्हा-दुल्हन बनाकर बैठाये ये सरकार जनता को तरह तरह के नाच नचा रही है. और हर प्रकार के सवाल और पटाक्षेपों से खुद को बचा रही है. दरकिनार कर रही है. जबकि केवल और केवल वही एकमात्र इस पूरी दुर्व्यवस्था की जिम्मेदार है. 



आधार कार्ड ; 
एक ऐसी अनिवार्यता जो पैदा की गई ! जबर्दस्ती. हर आदमी हर जगह आधार कार्ड जुड़वाता घूम रहा है. पूरे वीकेंड के बाद जो दो दिन सुकून के मिलते थे, अब उनमें भी चैन नही है. सरकारी फरमान पूरे करने हैं. औपचारिकताएं निभानी हैं. राशन कार्ड से लेकर सिम कार्ड तक हर जगह आधार अनिवार्य कर दिया गया है. ये निरा पागलपन नहीं तो और क्या है ? कहा गया कि आदमी का यूनीक आइडेंटिफिकेशन नंबर होगा जो उसकी बायोलॉजिकल पहचान को संरक्षित रखेगा. इससे भ्रस्टाचार और धोखाधड़ी जैसी चीजों पर लगाम लगेगी. अच्छी बात है, लगनी चाहिए लगाम. पर बिना किसी मजबूत इंफ्रास्ट्रक्टर और तैयारी के इतने बड़े देश की बॉयोमेट्रिक पहचान सरेआम कर दी गयी. लोगों के सिम बन्द हो गए, एटीएम बन्द हो गए, राशन मिलना बंद हो गया, मिड डे मील मिलना बंद हो गया. बताइये, ये कहां तक उचित है ? ये तो शुद्ध मनमानी है, निरंकुशता है. बाद में यही सेवाएं बहाल करने के लिए तरह तरह के शुल्क बसूले जा रहे हैं. लूट मची है. और आप कह रहे हैं कि भ्रस्टाचार पर लगाम है. लोग त्रस्त हैं. 
अभी गांव गया था तो देखा कि गांव में जो उचित मूल्य की दुकाने हैं, उनमें तो सरेआम लूट चल रही. कहीं कोई कमी नहीं आई है. आधार कार्ड के राशन कार्ड से जुड़ जाने के बाद भी वो तो 3 लीटर ही मिट्टी का तेल देता है एक कार्ड पर और चढ़ाता 4 है. 17 किलो गेंहू तौला उसने और 30 चढ़ाया. गरीब बेबकूफ़ नहीं है, मजबूर है. क्या करे, चुपचाप लेना पड़ता है. सरकार कुछ करती नहीं, सिवाय आधार कार्ड जुड़वाने घटवाने के और गरीब गांव में रहकर व्यक्तिगत दुश्मनी मोल ले नहीं सकता. बस ये है भ्रष्टाचार की गत. गांव में तो लोग कह रहे थे कि इस सरकार ने केवल आदमी को दौड़ाया है. कभी यहां कभी वहां. एक ओर प्रधानमंत्री जी औपचारिकताएं कम करने का हवाला देते हैं, वहीं दूसरी ओर रोज नई नई मुसीबतों को पैदा कर रहे हैं. व्यवस्थाएं और कॉम्प्लिकेटेड कर रहे हैं. उसके बाद आधार कार्ड की विश्वनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह उठे. उसके रख-रखाव और असुरक्षा पर. देश मे सरकारी डेटा कितना सुरक्षित है ?प्राइवेट कंपनियों द्वारा कलेक्ट किये गए डेटा के दुरुपयोग को रोकने का क्या कोई प्रावधान है ? क्या ये भूल जाया जाये कि साइबर क्राइम के युग में बड़ी से बड़ी सुपरपॉवर्स के कंप्यूटर हैक कर लिए गए हैं. और विश्व भर के तंत्र पर साइबर हमले जारी हैं. "Ransomware" वायरस हाल ही में IT जगत में तबाही मचाने वाला मसला है. क्या हमारा सरकारी तंत्र इससे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है ? क्या वो इसके भयावह परिणामों की जिम्मेदारी लेने को तैयार है ? या फिर सत्ता सरकार करोड़ो देशवासियों को अंधेरे कुएं में धकेल रही है, जिसका भविष्य न तो तय है, न सुरक्षित !




सरकार का दूसरा बड़ा निर्णय: नोटबन्दी 
 जिसने जनसामान्य को सीधे सीधे चोट पहुंचाई. देशभर में कतारें लग गई. अव्यवस्था और लाचारी का जो माहौल 6 महीने तक चला उससे देश की भारी बर्बादी हुई. लोग काम पर नहीं जा सके, दिहाड़ी मजदूरों से उनकी रोजी छिन गई. किसानों ने समय पर फसलें नहीं बो पायीं. दुकानों से ख़रीददार ओझल हो गया. लोग सब्जी खरीदने को तरस गए. जो जहां था, फंस गया. हर ओर सिर्फ लाइने ही लाइने दिखाई देती थीं. 6 महीने तक कतारों का सिलसिला चला. लोग हांफ गए. लेकिन प्रधानमंत्री जी के आवाहन पर इसे भी भ्रस्टाचार के खिलाफ कड़वी दवा जानकर पी गए. पर भ्रस्टाचार मिटा क्या ? नहीं, RBI ने अपनी सालाना रिपोर्ट पेश करते हुए कहा है कि जितने नोट चलन में थे,उनमें से अधिकांश वापस आ गए हैं. काला धन मिटाने का जुमला निर्मूल साबित हुआ. देश की अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई. खुदरा बाजार बुरी तरह प्रभावित हुआ. पर सरकार विरोध के स्वरों को बंद कराने में जुटी रही. कोई जिम्मेदारी नहीं. कोई जबाबदेही नहीं. वित्तमंत्री द्वारा तरह तरह के बचकाने बयान दिए गए. प्रधानमंत्री तो खैर दोबारा बोले ही नहीं. बिना किसी पूर्व तैयारी और पर्याप्त साधन जुटाये आत्ममुग्धता में अचानक लिया गया निर्णय 6 महीनों तक देश को तबाही और भुखमरी की कगार पर घसीटता रहा. सरकार की ऐसी घोर संवेदनहीनता और अदूरदर्शिता पर कोई नकेल नहीं है. ये सरकार खुले सांड़ की तरह जब तब अपने विरोधियों को कुचलती दबाती खुला तांडव कर रही है और दर्ज़नो जानें लील रही है.



तीसरा बड़ा निर्णय: GST
एक देश, एक कर ! प्रबुद्ध वर्ग ने GST पर तंज कसते हुए कहा है कि ये पहली ऐसी अद्भुत सरकार है, जिसने देशभक्ती के नाम पर टैक्स सेलिब्रेट करवा दिया. लोग पटाखे फोड़ रहे थे. पूरे देश में एकल कर प्रणाली जुलाई 1 से लागू है. व्यापारी वर्ग कंफ्यूज है. क्या करे क्या न करें. कोई GST को पूरी तरह समझ नहीं पाया है. शुरुआत में तमाम तरह के दावे किये गए थे. इससे व्यापार को बढ़ावा मिलेगा. रोजमर्रा की चीजें सस्ती हो जाएंगी. देश की इकोनॉमिक ग्रोथ को बल मिलेगा. वगैरह वगैरह ! पर हकीकत आसमानों की सैर नहीं करती जनाब, जमीन पर चलती है. और जमीन के हालात ये हैं, कि देश की पहली तिमाही में ही GDP बुरी तरह तहस-नहस हुई है. मौजूदा वित्तीय वर्ष में देश की अनुमानित विकास दर 7.5 से घटकर 6 पर आ गयी है. देश के बड़े बड़े अर्थशास्त्री GST के इम्लीमेंटशन को इसके लिए जिम्मेदार मान रहे हैं. खुद वित्तमंत्री ने अर्थव्यवस्था की हत्या पर शोक व्यक्त किया है. बाजार में हर चीज महंगी हुई है. आम आदमी की जेब पर बोझ बढा है. यहां तक कि सेनेटरी नैपकिन और कॉलेज फीस तक को नहीं बख्शा गया है. पर कुछ बोलने नहीं देंगे साहब. किसी को कुछ भी बोलने नहीं देंगे. विरोधियों पर ट्रोल के कुत्ते छोड़ रखे हैं. सेंसटिव मामलों पर चुप्पी साध रखी है. लोगों को गुमराह करने के लिए चैनल चला रखे हैं. नामकमियों को बाकायदा कफ़न उड़ाने का काम चल रहा है. जब भी जबाब देने की बारी आती है, तो सरकारी नुमाइंदे पिछली सरकारों की नाकामियां गिनाने लग जाते हैं. ये सरकार सिर्फ UPA की नाकामियों की दम पर दम भर रही है और कुछ नहीं. विपक्षी दलों में भी कोई खास दिखाई नहीं देता. सब फुटकर में बोलते हैं. एक एक करके. और बोलकर छुट्टियों पर निकल जाते हैं. शायद ही इतना कमजोर विपक्ष देश की संसद ने पहले कभी देखा हो. विपक्ष में धार नहीं. सत्ता निष्कंटक है. 


हाल ये हैं कि सत्ता पार्टी के ही समझदार लोगों को साहस जुटा कर बोलना पड़ रहा है. अभी हाल ही में पार्टी के अंदर से ही कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा विरोध के स्वर मुखर हुए हैं. जिनमें पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा का नाम सबसे आगे है. उन्होंने सरकार को उसकी अदूरदर्शी समझ और बिगड़ी अर्थव्यवस्था के लिए जिम्मेदार बताया है, और आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए आगाह भी किया है. इसके अतिरिक्त वरुण गांधी नें भी किसानों की अनदेखी का आरोप सरकार पर मढ़ा है. वे रोहिंग्या मामले पर भी सरकार के रुख के विपरीत राय रखते नज़र आये. 2014 के बाद एक नए प्रकार की BJP देखने को मिल रही है. जिसने अपने बुजुर्ग नेताओं को बंडल बनाकर संरक्षक दल में डाल रखा है. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और यशवंत सिन्हा उसी कैडर के लोग हैं. एक संरक्षक की तरह ही सही, प्रधानमंत्री को उनके बयान का स्वागत करना चाहिए था. बजाय इसके कि पार्टी का केंद्रीय मंत्रिमंडल ही उनके खिलाफ लामबंद हो जाये और भाषणबाजी करने लगे. कम से कम देश के वित्तमंत्री को तो ये कतई शोभा नहीं देता. प्रधानमंत्री जी ने भी इन्हीं आलोचनाओं पर टिप्पणी करते हुए ऐसे तत्वों को 'मामा शल्य' कहा है. जो अपने ही खेमे में नकारात्मकता फैला रहे हैं. प्रधानमंत्री जी का ये आचरण भी मसले को गंभीरता से लेने की बजाय थोथे में उड़ाने वाले ही है. पर अब जो प्रधानमंत्री जी को मामा शल्य नजर आ ही रहे हैं, तो लगे हाथ उन्हें इस महाभारत का दुर्योधन और शकुनी भी स्पष्ट कर ही देना चाहिए. क्योंकि 'भीष्म' ने तो अपना पक्ष बखूबी रख दिया है और अपनी मजबूरी भी जाहिर कर दी है. अब प्रधानमंत्री एंड कंपनी की बारी है कि वे कास्टिंग क्लियर करें. कुछ पता नहीं चल रहा, कौन कौरव कौन पांडव. वैसे ये जो महाभारत का जिक्र चला ही है तो इसी क्रम में मुझे सुप्रसिद्ध कवि सुरेंद्र शर्मा जी की चार लाइने याद आती हैं...



"कोई फर्क नहीं पड़ता

इस देश का राजा कौरव हो या पांडव

जनता तो बेचारी द्रौपदी है

कौरव राजा हुआ

तो चीरहरण में काम आएगी,

और पांडव राजा हुआ

तो जुए में हरा दी जाएगी !"
लेखक- अर्पित (smt2425@gmail.com)

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