प्रश्न धड़ों में बंट चुके हैं, और जबाबदेही अय्याशियां कर रही है. देश बड़ा है. मुद्दे बड़े हैं. रोज एक सुबह होती है. रोज एक खबर आती है. पर देखने में आता है कि खबर खबर नहीं रहने पाती. उसके टुकड़े हो जाते हैं. विरोध, विरोध नहीं रह जाता. उसके रस्ते मुड़ जाते हैं.
कभी किसी अति नीच अपराध के चलते अगर जनता अपनी दम पर कोई आंदोलन खड़ा भी करती है तो राजनैतिक दल उसका अधिग्रहण करने पहुँच जाते हैं.
विपक्ष को मौका मिल जाता है और मिट्टी पलीत हो जाती है. अच्छा खासा आंदोलन आंदोलन न रह के विशुद्ध राजनैतिक लामबन्दी में तब्दील हो जाता है. आरोप-प्रत्यारोपों के वाक-युद्ध में बेचारी घटना मारी जाती है. और प्रश्न फिर अधूरे छूट जाते हैं. मुद्दे फिर अधूरे छूट जाते हैं.
विपक्ष को मौका मिल जाता है और मिट्टी पलीत हो जाती है. अच्छा खासा आंदोलन आंदोलन न रह के विशुद्ध राजनैतिक लामबन्दी में तब्दील हो जाता है. आरोप-प्रत्यारोपों के वाक-युद्ध में बेचारी घटना मारी जाती है. और प्रश्न फिर अधूरे छूट जाते हैं. मुद्दे फिर अधूरे छूट जाते हैं.
हर खबर की एक उम्र होती है. पर आज के ख़बरनबीस उसकी समय से पहले ही हत्या कर दे रहे हैं. बिना उसके अंतिम परिणित पर पहुँचे उसके टुकड़े उड़ जाते हैं. जिसे जो हिस्सा भाता है, ले जाता है. और शाम होते ही दुकानें सज जातीं हैं. अपने अपने भोपुयों से अपना अपना राग. जिसकी जहां मर्ज़ी वो वहां मुँह मार रहा है. जिसकी जहां तक ज़द वो वहां तक कीचड़ उछाल रहा है. ख़रीददार भी बंट चुका है. पार्टियां भी बंट चुकी हैं. जिसे जो भा रहा है, देख रहा है. जिसे नहीं देख रहा है, वो रो रहा है. अपने अपने आदर्श, अपने अपने एजेंडे सेट हैं. महिमामंडन और भर्त्सना का दौर है. मुख्यतया दो धड़े हैं. एक देख नहीं रहा, एक सुन नहीं रहा. दोनो नोंचने में लगे हैं. दोनों गिद्ध हैं. सखी तुम नटनी, हम बौरा. इन गिद्धों ने समस्यायों को मूल बिंदु से भटका कर तार तार कर दिया है. और अपने अपने निजी हित साध लिए हैं. इस तरह से समय बीत जाता है. और ख़बर की उसके भ्रूण में ही हत्या कर दी जाती है. फिर रात आ जाती है. और अगले दिन फिर यही.
समस्याऐं टस से मस नहीं होतीं. जिन्हें जबाब देना होता है, वे भाषण दे रहे होते हैं. एक नया गुब्बारा फुला रहे होते हैं. गुबारा फटेगा, तालियां बजेंगी. थोड़ी देर कोई किसी को नहीं सुनेगा. थोड़ी देर हम भी किसी को नहीं सुनेंगे. क्या मानिंद ही तो हैं. अभी हैं, कल नहीं होंगे. इसी क्रम में एक के बाद एक विफलतायों की क़ब्रे बनती चलीं जा रहीं हैं. और ये देश हिंदुस्तान से कब्रिस्तान में तब्दील होता चला जा रहा है. यहां हर कोई एक दूसरे पर धूल डाल रहा है. हर तरफ होरी है, संरक्षण है, उकसावा है, भीड़ है. विलेन कोई नहीं है, सब हीरो हैं. कुछ अभी के, कुछ कल के. हमेशा पुरबाई ही थोड़े चलती है. मौसम है, हवा है कभी न कभी तो रुख़ मोडेंगी ही. और जब मोड़ेगी तब सारे प्रतिमान, सारे अलंकार, सारे किरदार बदल जायेंगे. सारे खेल पलट जायेंगे. पर बन्दर फिर भी नाचेगा. लोकतंत्र में बन्दर ही हमेशा नाचता है, सिर्फ मदारी भर बदलता है.
सब कुछ सही हो सकता है. पर कुछ लोग अपना काम मक्कारी से कर रहे हैं. वे दायित्वहीन नज़र आ रहे हैं. उन्होंने पर्दे के पीछे के खलनायक उजागर करने का काम लिया था. वे आज स्वयं अभिनय में शामिल दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में क्या उपाय बनता है कि ये तमाशा ख़त्म हो. जबकि वे खूब जानते हैं कि जब तक झंडेबरदारो की पगड़ियां नहीं उतरेंगी. उनके बैनरों में आग नहीं लगाई जाएगी. मजदूर और किसान भूखा मरना बन्द नहीं होगे. देश की दशा और व्यवस्था में सुधार नहीं आएगा. इसलिए इन लोगों को अपना कर्त्तव्यबोध होना बहुत जरूरी है. ये तो समाज की थाती थे. समाज के सूचक थे. इन्हें रोशनी दिखाने का जिम्मा दिया गया था. ये ख़ुद राहु बन बैठेंगे तो कैसे होगा ? आत्मघात के छद्मयुद्ध में वीर और विशिष्ट बनना छोड़े. कलम गहें. कलम की गरिमा गहें. सत्य कहें, सत्य लिखें. हतो यदि वा प्राप्यसि स्वर्गम, जित्वा वा भोज्यसे महीम. अर्धसत्य विश्वासघाती है. अति की अति विनाशकारी है. समय रहते चेत जाओ अन्यथा तुम्हारी ही ये नपुंसकता तुम पर भारी पड़ेगी. और जब आज का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें तुम्हारी नालायकी और पथहीनता के शिलालेख छपे होंगे !
✍ लेखक- अर्पित (smt2425@gmail.com)
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