स्वतंत्र लेखिका | हिंदी पत्रकारिता, दिल्ली विश्वविद्यालय
दहेज़ के रूप में दूसरे के बेटे को गाड़ी देने से बेहतर है कि अपने ही बेटे को गाड़ी दिला देनी चाहिए...ताकि दहेज़ के रूप में गाड़ी के लेन देन का प्रचलन खत्म हो जाये!
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