धारावाहिक मनुष्य के जीवन का अभिन्न का अंग बन गया है। हर घर में धारावाहिक का बोलबाला है। यह मनोरंजन का अहम माध्यम बन चुका है। शाम को सात बजे से रात्रि ग्यारह बजे तक अक्सर हर घर में धारावाहिक चलता हुआ दिखाई देगा। जिस तरह से इंसान खाने के बिना नही रह सकता उसी तरह से धारावाहिक के बिना भी नही रह सकता। हर वर्ग के व्यक्ति इसमें दिलचस्पी रखते है। वैसे धारावाहिक के मामले में महिलाऔं पर व्यंग्य कसा गया है कि उन्हें कुछ मिले या न मिले पर धारावाहिक देखने को जरूर मिलना चाहिए। लेकिन ये कुछ हद तक की सही क्योंकि आज पुरूष बच्चे सभी इसमें रूचि रखते है। धारावाहिक में सास बहु की तीखी मीठी तकरारे सबके मन को भाति है। धारावाहिक का किरदार हर दिल को भाता है। अभिनय क्या कमाल के होते है। तीस मिनट का धारावाहिक देखने के लिए लोग दो घंटे बर्बाद कर देते है क्योकि धारावाहिक शुरू होने से पहले और उसके खत्म होने के बाद उसी के बारे मे सोचते रहते है। यही तो धारावाहिक का कमाल है कि वह अपने कला से लोगों को बाधे रखता है। इससे लोग बोर नहीं होते है बल्कि इसकों वे सालों साल तक देखने में आनंद प्राप्त करते है। कुछ धारावाहिक तो ऐसे है जो सालों साल से चले ही आ रहे जैसे -बालिका वधू, दिया और बाती हम आदि।
धारावाहिक के दो पहलू होते है एक सकरात्मक और दूसरा नकरात्मक। ये बात तो खरे सोने जितनी सच्ची है कि किसी भी चीज का नकरात्मक प्रभाव जल्दी ही लोगों पर असर करता है। ठीक इसी तरह धारावाहिक में दिखाए गए गलत चीजों को इंसान जल्द ही अपने आचरण में उतारता है। इसका प्रभाव समाज में देखने को मिलता है। समाज में फैली तमाम बुराईयां धारावाहिक की ही देन है। चोरी किस तरह से और कौन कौन से तरीकों को अपना के कर सकते है यह सभी आजकल के धारावाहिक में दिखाए जाते है। बात सिर्फ चोरी डकैती तक ही सीमित नही है और बल्कि अन्य सभी अपराध को खुलेआम दिखाया जाता है। पश्चिश्मी सभ्यता जो भारत में आ चुकी है इसका श्रेय किसी और को नही बल्कि धारावाहिक को ही जाता है। इसकी चमक चांदनी ने लोगों को अंधा बना दिया है। अंधविश्वास को बढ़ावा देने में धारावाहिक की जितनी आलोचना की जाए उतनी ही कम है। डायन,भूत नागिन इस तरह की कई सारी चीजों को दिखाते है जिससे आम जनता के अंदर अंधविश्वास पनपता है।
घर में फूट डालने में तो इसने आग में घी डालने वाला काम किया है। लोगों के तलाक हो रहे है क्योंकि वे खुद की जिदंगी को धारावाहिक जैसे बनाने की चाह में कुछ गलत कदम उठा लेते है जिसके कारण उनके रिश्तों में दरार पैदा हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप तलाक हो जाता है। बच्चे समय से पहले ही बड़े हो रहे यह धारावाहिक का ही दुष्परिणाम है। जिस बात को समझने की उनकी उम्र नही होती है उस बात को धारावाहिक के जरिए खुलेआम प्रस्तुत किया जाता है। जो उम्र बच्चों के पढ़ने लिखने की होती है उस उम्र में वे गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड के चक्कर में पड़ जाते है। जिस उम्र में हमारे हाथ मे खेलेने के लिए खिलौने होते थे आजकल के बच्चे उस उम्र में साथ जीने मरने की कसमें खाते हुए दिखते है। यही धारावाहिक का परिणाम है जिसे हम दिनभर देखते रहते है। हालांकि सभी धारावाहिक एक जैसे नही होते है कुछ धारावाहिक बहुत अच्छे होते है जिसे कोई भी बिना किसी दुष्परिणाम के देख सकता है जैसे - तारक मेहता का उल्टा चश्मा। यह मात्र एक ऐसा धारावाहिक है जो हमारे अंदर एकता और प्रेम की भावना को जाग्रत करता है।
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