गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

सजा के लिए उम्र पर गुनाह के लिए नही

गुनहगार को सजा देना और देश में सुख शांति बनी रही आदि बातों के लिए ही देश में कानून का निर्माण किया जाता है। हम सभी जानते है कि गुनहगार तो सिर्फ एक गुनहगार ही होता है तो फिर क्यों गुनाह की सजा देने के लिए उम्र की बेड़िया कानून में बनायी गई है। र्निर्भया कांड के तीन साल के बाद भी निर्भया के गुनहगारों में से एक गुनहगार को सजा नहीं मिली क्योंकि वो नाबालिग है। समझ नहीं आता है कि कैसा कानून है जहाँ गुनाह करने के लिए कोई उम्र सीमा निर्धारित नही है और उस गुनाह की सजा के लिए उम्र सीमा निर्धारित है। जब आज कल के बच्चे उम्र से पहले बड़े हो जाते है कि वे संगीन अपराध को अंजाम देने में जरा भी हिचकिचाते नही है तो फिर उन्हें उस अपराध की सजा क्यों नही दी जाती है। क्या यही है हमारा लोकतंत्र जिसमें एक गुनहगार को यह कहकर छोड़ दिया जाता है कि वो अभी नाबालिग है। नाबालिग मतलब उसको सही गलत का ज्ञान नहीं लेकिन सवाल ये है कि अगर वो नाबालिग है तो वे इतने संगीन अपराध को कैसे अंजाम दे सकता है इसका तो बस यही कारण नजर आता है कि वह समय से पहले ही बड़ा हो जाता है। नाबालिग की उम्र सीमा 17 वर्ष तक निर्धारित है लेकिन असल माने नाबालिग तो वे है जिनकी उम्र 12 वर्ष तक है। लेकिन यहां बात ये नही है कि नाबालिग की उम्र कितनी होनी चाहिए या कितनी नही। मुद्दा यह है कि
संगीन अपराध जैसे - बलात्कार,खून इत्यादि की सजा होनी चाहिए फिर चाहे वे नाबालिग हो या नही।

     बलात्कार को अंजाम देते हुए तो वह ये नहीं सोचता है कि वह अभी बच्चा है उसे किसी लड़की की जिन्दगी को बर्बाद करने का हक़ नही है। तो फिर उसे उस गलती नही गुनाह(क्योकि गलती तो माफ की जा सकती है पर गुनाह नही) की सजा देने में हमारा कानून इतना क्यों सोचता है। जिस लड़की की जिन्दगी बर्बाद हो जाती है तो क्या उसको न्याय न देने कि बजाय उसे यह कह दिया जाए कि आपके साथ जो कुछ हुआ हम उस पर कोई प्रतिक्रिया नही दे सकते है आपको तसल्ली रखनी होगी क्योंकि वह नाबालिग है। नाबालिग नाबालिग सुनते सुनते कान पक जाते है पर न्याय का कोई अता पता नहीं अरे भाड़ में जाए ऐसे नाबालिग। अरे धिक्कार ऐसे कानून पर जो एक गुनहगार को छोड़ देता है और पीड़िता को फिर से बिना किसी गलती की सजा दे दी जाती है। निर्भया तो भगवान को प्यारी हो गई और उसकी आत्मा को शांति भी नही मिली होगी क्योंकि अब भी उसका एक गुनहगार खुलेआम घूम रहा है लेकिन आज भी उसके परिवार वाले इस देश के कानून को कोसते आ रहे है और उनके मन में यही सवाल है कि उनकी निर्दोष बेटी को इंसाफ कब मिलेगी। ये तो केवल एक निर्भया की बात है ऐसी न जाने कितनी निर्भया और दामिनी होगीं जिसको न्याय दिलाने में हमारा कानून खुद को लाचार महसूस करता है।

       आजकल 13-14 साल के बच्चे प्यार करते है साथ जीने मरने की कसमें खाते है पर जब उनसे कोई गुनाह हो जाता है तब हम उन्हें नाबालिग क्यों ठहरा कर उन्हें माफ़ कर देते है। कुछ लोग कहते है कि प्यार करने कि कोई उम्र नहीं होती है तो इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैं भी कह रही हूँ कि गुनहगार को सजा देने के लिए कोई उम्र नहीं होनी चाहिए। हर गुनाह को अंजाम देने वाले गुनहगार को सजा मिलनी ही चाहिए। ये कैसा लोकतंत्र है जहाँ किसी के गुनहगार को यह कहकर राहत दे दी जाती है कि अभी वह बच्चा है। उस पीड़ित के बारे में क्यों नही सोचा जाता है कि उसे इंसाफ़ की जरूरत है। क्या उम्र ही सब कुछ है किसी की बर्बाद हुई जिदंगी का कोई मोल नहीं है जो नाबालिग नाबालिग का जप किया जाता है। जब कोई लड़की संगीन अपराध का शिकार होती है तो वह पूरी तरह से टूट जाती है लेकिन उसके अंदर एक उम्मीद जगी रहती है कि उसके गुनहगार को सजा जरूर मिलेगी। सजा से उसका दर्द कम तो नहीं होता है पर उसे थोड़ी सी तसल्ली जरूर मिल जाती है लेकिन अगर उसे यह पता चला कि उसके गुनहगार को यह कहकर छोड़ दिया गया है कि वह नाबालिग है तो उसकी तकलीफ़ और बढ़ जाती है। हालाकिं हमारे कानून में बाल सुधार की व्यवस्था है जिसके तहत किसी भी नाबालिग गुनहगार को तीन साल तक बाल सुधार में रखा जाता है। लेकिन सवाल उठता है कि जब देश एक गुनाह, एक तो गुनाह की सजा अलग अलग क्यो। जब तक नाबालिग के लिए कड़े कानून का निर्माण नही होगा तब तक बढ़ रहे नाबालिग गुनहगार कम नहीं होगे।

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