शनिवार, 19 दिसंबर 2015

मुआवजा मदद या राजनीति

आजकल लोगों में आक्रोश का माहौल बहुत ज्यादा हो चुका है। बढ़ते आक्रोश के कारण वे हिंसा करने पर ऊतारू हो जाते है जिसके परिणामस्वरूप वे दुर्घटना के शिकार हो जाते है। दुर्घटना का भरपूर फाय़दा राजनीति दल उठाते है मुआवजा देकर। मुआवजा देकर वे केवल सहानुभूति जताते है बल्कि राजनीति को भी चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ते है। चालाक नेता के चालाकी का फायदा कई लोग गलत तरीके से उठाने लगते है जैसे लालच में आकर और अधिक मुआवजे की मांग करना। लालच का परिणाम कितना भयानक होता है ये किसी से छुपा नहीं है।

                 कथित तौर पर मुआवजा किसी के जीवन के बदले मिलने वाला एक मदद है। आजकल तो इसकी बहार है हर सरकार अपने राज्य के पीड़ित परिवार को मुआवजा देकर खुश करना चाहती है। किसी की जान की कीमत का सौदा समझा जाए मुआवजा देना तो गलत नहीं है। बात चाहे छोटी हो या बड़ी हर जगह मुआवजा के आड़े राजनीति के गंदे मनसूबे को अंजाम दिया जाता है। राजनीति के खिलाड़ी  जनता के भावनाओं से खेलनें में बिल्कुल माहिर है मुआवजा देना भी इसी खेल के तहत आता है। मुआवजा का नाम सिर्फ मदद कथित तौर पर ही है, असल में देखा जाए तो ये वोट बैंक बढ़ाने की चाल है। एक जिन्दगी के बदले चंद रूपये देकर ये सरकार क्या जताना चाहती है ये तो केवल वही जान सकती है। रूपया चाहे कितना बड़ा ही क्यों हो पर किसी के जिन्दगी के बराबर हो ऐसा तो नहीं है तो फिर क्यों ये सरकार मुआवजा का झूठा खेल खेलकर पीड़ित परिवार का मजाक बनाती है। यहां मैं आपको बता दूँ कि मैं मुआवजा के विरूद्ध नहीं हुँ मैं तो केवल इस बात के विरोध में हुँ कि जो मुआवजा देने के पीछे अपनी राजनीति का स्वार्थ पूरा किया जाता है। मुआवजा अगर मदद के तहत दिया जाए तो गलत नहीं है लेकिन जो मन में राम और बगल में छुरी अर्थात दिखावे के लिए कुछ है और असलियत इसके बिल्कुल विपरीत है। इस बात से मुझे ऐतराज है।

      मुआवजा एक राजनीति खेल है। मसलन के तौर पर दिल्ली के आनंद पर्वत इलाके में इसी साल हुए एक हत्या मामले में जिसमें एक लड़की की सरेआम हत्या कर दी गई थी जिसके कारण दिल्ली के कानून व्यवस्था पर कई सारे सवाल खड़े हुए थे। मीडिया में भी इस मामले को पूरे जोर शोर से दिखाया गया था। दिल्ली सरकार ने उस लड़की के परिवार को पांच लाख रूपये का मुआवजा दिया। प्रश्न यह उठता है कि क्या पांच लाख रूपये से उस लड़की की जान वापिस सकती है अगर नहीं तो आखिर क्यों उस लड़की की जान की कीमत लगाई गई। मुआवजा देकर सरकार ने अपनी वाह वाही लुटी और पीड़ित परिवार के मुँह पर पैसों का जोरदार तमाचा पड़ा। अगर मुआवजा देने के बजाय सरकार कुछ कड़े कदम उठाती तो शायद आगे चलकर ऐसे मामले देखने को नहीं मिलते। ऐसा लगता है जैसे ये राजनेता किसी के जान की बोली लगाते है किसी को दस लाख तो किसी को पांच लाख देते है। किसी हत्या मामले में अगर आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए तो यह मुआवजा से बेहतर साबित होगा और सजा मिलने के कारण पीड़ित परिवार को इंसाफ मिल जाता है। पैसा तो हाथ का मैल है जो आज है कल नहीं होगा इसलिए मुआवजा से बेहतर है कि किसी और तरीके से बात का समाधान किया जाए। कभी कभी मुआवजा का लोग गलत फाय़दा उठाते है जैसे जब किसी के हाथ में बिना किसी मेहनत के ज्यादा पैसा जाता है तो उसका दिमाग संतुलित नहीं रहता और वह कई गलत कदम उठाने लगता है क्योंकि कहा जाता है कि जरूरत से ज्यादा पैसा लोगों का दिमाग खराब कर देता है।


      मुआवजा के नाम पर किसी को सरकारी नौकरी दे दी जाती है चाहे वह उस नौकरी के काबिल हो या हो। ये उन बेचारे बेरोजगारों के मुँह पर जोरदार तमाचा है जो सरकारी नौकरी की तलाश में कतार में खड़े हुए है। किसी दुर्घटना के तहत अगर किसी परिवार के कमाने वाले की मौत हो जाती है तो उसके परिजनों को पांच लाख रूपये और सरकारी नौकरी दिया जाता है। अगर कमाने के लिए नौकरी दी जाती है तो क्या पैसे से उसके जान की कीमत लगाई जाती है। मुआवजा देने के कारण कई बार पीड़़ित परिवार लालच में जाता है जिसके परिणामस्वरूप वे अधिक मुआवजे की मांग करते है और उनकी मांग पूरी होने पर वे इधर उधर तोड़ फोड़ करने लगते है। उदाहरण के लिए कुछ महीने पहले ही दिल्ली में एक बस ड्राइवर की दुर्घटना में मौत हो गई थी तो उसके परिवार को दिल्ली सरकार ने मुआवजा के तहत पैसा और नौकरी दी लेकिन पीड़ित परिजन के अंदर लालच समा गया और वे अधिक पैसों कि मांग करने लगे मांग पूरी होने पर उन लोगों ने बसों की हड़ताल करने के साथ ही तोड़ फोड़ भी किया।

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