गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

बेलगाम दिल्ली सरकार?..


सीबीआई जांच नही ऐसा लगा जैसे भूचाल गया। ये सीबीआई जांच तो मीडिया में पूरी तरह से छा गया। आपको याद दिलाना चाहूँगी कि बीते मंगलवार को देश की केंद्रीय ब्यूरों जांच एंजेसी ने दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव राजेद्र कुमार के घर, दफ्तर समेत पद्रंह जगह छापेमारी की। छापेमारी के दौरान राजेद्र के घर से तीन लाख रुपये की विदेशी मुद्रा और दो लाख चालीस हजार कैश बरामद होने के साथ ही तीन अचल संपति के कागजात भी सामने आए। राजनीति में तो जैसे बहार सी गई इस छापे से आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया। इसका पूरा श्रेय दिल्ली के मुख्यमंत्री को जाता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने ट्वीट करके बताया कि मुख्यमंत्री कार्यालय में छापे की जा रही है हालाकि कि इस कथन को सीबीआई ने खारिज कर दिया। बेबाक केजरीवाल ने देश के प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि राजनीति से हार गये तो इस तरह की कायरता दिखा रहे है। इनका हाल भी कांग्रेस की तरह ही होगा। बतौर मुख्यमंत्री देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसे अपशब्दों का प्रयोग करना उचित नहीं है। इस बात से राजनीति माहोल पूरी तरह से गर्म हो गया और एक के बाद एक बयान आने लगे। इस बात पर जब माहौल गर्म होने लगा और बीजेपी के द्वारा अपशब्दों के लिए माफी़ की मांग हुई तो केजरीवाल सामने आए और उन्होनें एक बार फिर तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया।

    सांच को आच नही इसका तात्पर्य है कि जो सच्चे होते है उन्हे किसी बात का डर या किसी बात से बेवजह परेशानी नहीं होती है लेकिन दिल्ली की ईमानदार सरकार आखिर क्यों इस बात से परेशान हो रही है यही सवाल आज हर किसी के मन में पनप रहा है। सवालों के घेरे में एक बार फिर से दिल्ली सरकार बेलगाम होती नजर रही है। अभी तक दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव पर लगे आरोप साबित नही हुए है तो ऐसे में क्यों परेशानी में नजर रही है दिल्ली सरकार। केजरीवाल को इस बात का मलाल है कि मुख्यमंत्री को विश्वास के पात्र नहीं समझा गया और उनका आरोप है कि सीबीआई उनके दफ्तर से कुछ मुख्य फाइल ले गई। आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि राजेंद्र कुमार तो बहाना, असल में केजरीवाल पर निशाना था। सच या झूठ कुछ भी हो लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि केजरीवाल आक्रोश में आकार कुछ ज्यादा ही बयानबाजी कर गये। खैर छोड़िये ये राजनीति की बाते है हमारे और आपके समझ में नहीं आने वाली है। यहां पर अर्ज किया है ---

कौन किसका है कौन किसका नहीं है,

ये राजनीति है भई,

इसका काम तो बस इतना है कि देश को लूट खाना है।

     बीजेपी जब सत्ता में नहीं थी तब कहती थी कि सीबीआई तो केंद्र सरकार के हाथ की कठपुतली है। तो यह बात तो आज भी सही हो सकती है कि सीबीआई बीजेपी के इशारों पर चल रही है फिर आज जब दिल्ली सरकार यह कह रही है कि ये केंद्र सरकार की साजिश है उसे बदनाम करने की तो बीजेपी वालों को क्यों मिर्ची लगी। केजरीवाल का ये कहना है कि ये केंद्र ने वित्त मंत्री अरूण जेटली की डीडीसीए घोटालों की फाइल को लेने के लिए ही ये छापेमारी करवा रही है। हालाकि उन्होने बाद में कहा कि मेरे बयान के बाद सीबीआई वाले जेटली से संबंधित फाईल को यही छोड़ गये लेकिन उनका मकसद जेटली के खिलाफ सबूत को हटाना था। अगर केजरीवाल की बात सही है तो ये केंद्र सरकार की सोची समझी साजिश हो सकती है। दिल्ली सरकार अगर बेलगाम होने की बजाय कार्रवाई में चुपचाप बिना हंगामा किये साथ देती तो शायद ये मामला इतना शोर नहीं मचाता। दिल्ली सरकार को चाहिए कि वे मामले को इतना बढ़ाये बल्कि अगर उनके प्रधान सचिव दोषी पाये गये तो उन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने में मदद करनी चाहिए। बिना किसी नतीजे अगर कोई सरकार बेलगाम हो जाती है तो उसकी छवि धूमिल होने लगती है इसलिए केजरीवाल सरकार को नतीजे की प्रतीक्षा करनी चाहिए उसके बाद ही उसे जो कहना है कहै। मानती हुँ कि अगर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठता पर बात आती है तो वो थो़ड़ा बौखला जाता है लेकिन क्या जिस तरह से केजरीवाल ने खुद को प्रस्तुत किया वह किस हद तक सही है। जब तक इंसान किसी संस्थान से जुड़ा नहीं होता है तब तक उसका व्यवहार कैसा हो इस बात से किसी को कोई फर्क नहीं पड़़ता है लेकिन जब वहीं व्यक्ति किसी संस्थान या किसी बड़े औदे पर होता है तो उससे प्रेमपूर्वक अच्छे व्यवहार की उम्मीद होती है कि बेलगाम होने की।

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