भूलना एक ऐसा शब्द है जिसका प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनकाल के दौरान कई बार करता है। कई लोगों को तो इसकी बिमारी होती है वे इस शब्द का कुछ ज्यादा ही प्रयोग करते है इसलिए वे इसके दुष्प्रभाव से ग्रसित हो जाते है। एक सामान्य भूलना और असमान्य भूलने में जमीन आसमान का फर्क़ होता है। सामान्य भूलना दैनिक जीवन की जरूरत बन चुकी है लेकिन असमान्य भूलना दैनिक जीवन के लिए घातक साबित हो जाती है। ये बिमारी और आदत दोनों ही है। कभी कभी जो चीजें हमें अच्छी नहीं लगती है हम उसे जानबूझकर ही भूला देते है लेकिन कई बार हमारे भूलने की वजह से हमारा नुकसान हो जाता है क्योंकि हम जरूरी चीज़ को भूल जाते है। आजकल भूलना एक बहाना बन गया है मसलन के तौर पर बच्चे गृहकार्य न करने पर अध्यापक से ये बोलते है कि कॉपी घर पर भूल गये।
अक्सर लोग दवा लेना, रास्ते में छाता आदि ही भूलते है। दवा लेना इंसान खुद ही भूलता है क्योकि वह कड़वी दवा से बचना चाहता है। स्कूल के दिनों में मैने एक कहानी पढ़ी थी जिसका शीर्षक था -फॉरगेट यानि भूलना। ये लेख उसी कहानी से संबंधित है। जहाँ एक तरफ ये भूलना किसी के लिए के लिए कष्टदायी बन जाता है, वहीं दूसरी तरफ इसके कारण ही मजेदार कहानी बन जाती है। वैसे ये बात तो बिल्कुल सच है कि जिन्दगी में छोटी मोटी चीजों को भूलने से खुशियां मिलती है। कई बार ऐसा होता है कि हम कुछ भूल जाते है बाद में उस भूलने वाली कहानी को अपने घरवालों या मित्रों से साझा करते है तो वे हँसते जिसका बुरा हमें लगता है कि वे हमारा मजाक बना रहे है लेकिन हकीक़त तो ये है कि उस बात से उनके चेहरे पर जो हँसी आती है वो बिल्कुल सच्ची होती है, यह बात तो किसी से छुपी हुई नहीं है कि किसी को हँसाने से अच्छा और कोई काम नहीं है। लेकिन ये भूलना भी एक हद तक ही अच्छी लगती है वरना अंजाम क्या होता है इस बात से आप बेखबर नहीं है।
अरे आजकल तो एक नया रूप भूलने का दिखता है वो रूप है अगर आपका कोई मित्र आपसे कहे कि मेरे फोऩ में रिचार्ज करा दो तब आप बहुत जल्दी ही उसे हाँ कह देते है लेकिन दिन बीतने या उसके द्वारा दुबारा ध्यान दिलाने पर आप बड़े ही मासूमियत के साथ जवाब देते है कि दत् तेरी की ध्यान से निकल गया या भूल गया। काम करने की इच्छा नही होती है तब ही ज्यादा हम भूलने जैसे शब्द का प्रयोग करते है। लेकिन जैसा कि मैने पहले ही बता दिया है कि ये केवल कुछ ही मामलों में आंनद पहुँचाते है बाकि अगर आप भूल गये तो समझों आपकी खैर नहीं। उदाहरण के लिए आप अपनी पत्नी का जन्मदिन भूल कर देखिए आपका हश्र धोबी का कुत्ता न घर का न घाट के जैसी होने में बिल्कुल देर नहीं लगेगी। इसी तरह के तमाम उदाहरण आपको देखने को मिलते है। भूलना एक आम बात हो गई है। छोटी छोटी चीजे भूलकर हम खुश रहते है। वैसे भूलना तो मनुष्य का अभिन्न अंग बन चुका है। अगर कहा जाए कि भूलने के बिना मनुष्य जीवन अधूरा है तो ये बिल्कुल गलत नहीं होगा। बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी छोटी छोटी बाते भूल जाते है। किसी की स्मरण शक्ति कितनी भी अच्छी क्यों न हो लेकिन वो भूलने का शुभ काम किये बिना बिल्कुल भी नहीं रह सकता है।
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