आश टूट गयी, भरोसा उठ गया
और
आखें भीगी की भीगी रह गयी।
तीन साल की उम्मीद टूटने पर कैसा लगता है कोई जाकर निर्भया के अभिभावक से पूछे। क्या कसूर था उस लड़की का, किस बात की सजा उसे दी गयी। क्या उस लड़की का रात को घर से बाहर निकलना गुनाह था, क्या इसी गुनाह की सजा उसे मिली थी? दिसबंर की वो काली रात शायद ही कोई याद करना चाहेगा जब निर्भया हैवानियत की शिकार हुयी थी। उसे क्या पता था कि वो रात उसकी जिन्दगी को मिटा कर रख देगी। तीन साल पहले दिल्ली में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को हिला दिया था। हैवानियत की शिकार होने के बावजूद देश की इस बहादुर बेटी ने दस दिनों तक गंभीर हालत में अपने इंसाफ के लिए जिन्दगी और मौत से संघर्ष करती रही लेकिन उसके संघर्ष का ये अंजाम होगा ऐसा उसे पता नहीं था।
इंसाफ, इंसाफ और इंसाफ की गुहार करते हुए पूरा देश सड़को पर उतर आया था। इंसाफ हुआ लेकिन वो इंसाफ कुछ ही सालों के लिए साबित हुआ। निर्भया के गुनहगारों में से एक गुनहगार नाबालिग था इसलिए भारतीय कानून के हिसाब से तीन साल तक की कैद के बाद अब उसे आजाद करने का फैसला आया है। फैसले से नाखुश निर्भया के अभिभावक एक बार फिर से सड़को पर उतर आये है। उनकी अपील है कि एक बार फिर से निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए लोगों को सड़को पर उतरना चाहिए। निर्भया की माँ का कहना है कि जुर्म जीत गया और इंसाफ हार गया। फैसले से लोगों में आक्रोश का माहौल बन गया है। शनिवार की देर रात को महिला आयोग की अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश के घर उस दोषी की रिहाई को रोकने की अपील लेकर गयी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए सोमवार का दिन निर्धारित किया लेकिन मुजरिम की रिहाई पर कोई रोक नहीं लगाई। ऐसे में निर्भया राजनीति का मुहरा मात्र बन कर रह गयी। राजनीतिकरण इस मामले पर भी की जा रही है शर्म आनी चाहिए उन्हें जो लोग अपनी राजनीति को चमकाने में लगे हुए है।
ये कैसा इंसाफ है जहाँ एक गुनहगार को नाबालिग कहकर आजाद किया जा रहा है। बलात्कार के समय यही वह नाबालिग है जिसने राड डाला था तब तो वह बच्चा नहीं था जो आज उसे बच्चे की परिभाषा देकर आजाद किया जा रहा है। अरे बच्चे तो भगवान का रूप होते है और इस बच्चे ने तो ऐसा कारनामा किया है जिसे करने के बारे में कोई और सोच ही नही सकता है तो किस आधार पर इसे बच्चा करार दिया गया? क्या सिर्फ उम्र के आधार पर बच्चे की परिभाषा तय की गयी है। वक्त तो तीन साल पहले ही आ गया था कानून में संशोधन करने का लेकिन अभी तक बेबस कानून में कोई परिवर्तन नही लाया गया। अरे क्या कानून निर्माता किसी और निर्भया का इतंजार कर रहै है जो अभी कानून में परिवर्तन नहीं लाया गया । आज सब बोल रहे है कि हमारे हाथ कानून से बधें है तो मैं उनसे पूछना चाहती हुँ कि क्या अभी तक वे सो रहे थे या इसी दिन का इतंजार कर रहे थे। उम्र की बेड़ियों से निकलकर कानून बनाना पड़ेगा अन्यथा अंजाम क्या हुआ है इस बात से कोई बेखबर नहीं है।
ऐसा कानून किस काम का जहाँ किसी को इंसाफ नहीं मिल पा रहा है और इंसाफ मिलता भी है तो तब जब हंगामा खड़ा होता है। वह दोषी सिर्फ निर्भया मात्र का नहीं है बल्कि वह पूरे देश का दोषी है अगर आज उसे रिहाई मिली तो ये निर्भया के साथ साथ पूरे देश की हार होगी। आज सबकी यही गुहार है कि निर्भया को इंसाफ मिले। दोषी को तीन साल के लिए बाल सुधार घर में रखा गया लेकिन इस बात की जिम्मेदारी कौन लेगा कि आगे जाकर वह कोई गलत काम नहीं करेगा? जब कोई जिम्मेदारी नहीं ले सकता है तो आखिर क्यों उसे आजाद किया जा रहा है? निर्भया कल भी रोई थी और आज भी अपने गुनहगार को आजाद होते देख रो रही होगी।
अगर आज यह नाबालिग गुनहगार आजाद हो गया तो इसके जैसे कई और नाबालिगों को हौसला मिल जायेगा गुनाह करने का। जुर्म की राह पर नाबालिग चलने लगेंगे क्योंकि इस रिहाई को देख उन्हे कानून का डर नहीं होगा और परिणामस्वरूप इसके जैसे कई और नाबालिग जुर्म करते हुए दिखाई देंगे।
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