परिवर्तन संसार का नियम है ये कथन पूर्णतयाः सत्य है। कहा जाता है कि जो लोग वक्त के साथ खुद को नहीं बदलते है वो पीछे रह जाते है लेकिन ये हर मामले में सही साबित हो ऐसा तो नहीं सकता है। मीडिया जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है अगर वह बदलें तो ठीक है लेकिन उसके उद्देश्य में जो बदलाव आया है उसे समाज स्वीकार नहीं कर पाएगी। आज मीडिया एक दूसरे के होड़ में कुछ कदम ऐसे उठा रही है जो एक सभ्य देश की मीडिया को कतई शोभा नहीं देती है। आज की मीडिया अपनी जिम्मेदारी को उठाने में नाकामयाब साबित हो रही है। जनता सरकार के पास नहीं जाती है, वह अपनी आवाज मीडिया के जरिए सरकार तक पहुचाने का सपना देखती है। लेकिन अफसोस आज की बिकाऊ मीडिया आम जनता के उम्मीदों को खुलेआम तोड़ने में जरा भी नहीं हिचकिचाती है। आज जनता की यही पुकार है कि उसे देश की पहली वाली मीडिया चाहिए जो उसके हक़ के लिए लड़े और पत्रकारिता को अपना मिशन समझे न कि उसे व्यवसाय समझे। सच के हर पहलू पर टिके रहने की बजाय बिन पेदी का लोटा बन रही है आज की सरोकार की मीडिया। जहां पैसा मिला वहीं लुढ़कने वाली मीडिया से हमारा सामना हो रहा है। आज देश के नेता और मीडिया में कोई फर्क नहीं बचा है क्योकि नेता भी बिकता है औऱ पत्रकार भी बिक रहा है। बिन नेता मीडिया नही और
बिन मीडिया नेता नही।
बिन मीडिया नेता नही।
मीडिया का लक्ष्य है कि वह समाज में फैली हर बुराई को मिटाकर उजाला भरे लेकिन यहाँ तो उल्टी गंगा ही बह रही है। सनसनी खेज,गंदे विज्ञापन ये कम थे क्या जो आजकल बेशर्मी की सारी हदें पार करती हुई मीडिया अपना सीना ठोकती हुई नजर आती है। बात चाहे प्रिंट मीडिया की हो या फिर इलैक्ट्रानिक मीडिया हो या फिर मीडिया के नये रूप यानी आनलाइन मीडिया की हो लेकिन सच्चाई तो यही है कि मीडिया के सभी रूप अपने उद्देश्य को भूल चुकी है। घर का भूला अगर शाम तक घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते लेकिन हमारी मीडिया कभी घर वापस आयेगी कि नहीं इस बात का कुछ अता पता नहीं। समाज में जो तबाही मची हुई है ये मीडिया की ही देन है। जिस मीडिया को चाहिए कि वे समाज में फैले अंधविश्वास को मिटाए लेकिन वहीं मीडिया जिस तरह से सुबह सुबह राशिफल,कालचक्र जैसे कार्यक्रम को प्रसारित करती है तो ऐसा लगता है कि जैसे कि अंधविश्वास का दूसरा नाम ही मीडिया है। समझ ही नही आता है कि आखिर किस लक्ष्य पर मीडिया काम कर रही है। मीडिया को अगर भगोड़ा कहा जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि ये सच्चाई से भाग और अपने वजूद से भाग रही है।
मीडिया के रूप में आए परिवर्तन के तहत वेबसाइट का जन्म हुआ। यह एक ऐसा रूप है जो यह पूरी तरह से साबित करता है कि मीडिया भटक गई है। फेसबुक जो आज अभिव्यक्ति का माध्यम है उस पर मीडिया के बने पेज पर इतने गंदे पोस्ट मिलते है जिसकी हद ही नही है। वेबसाइट के जरिए मीडिया अश्लीलता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। मीडिया को ये क्यों नही समझ पा रही है कि आजकल 12 से 14 साल तक के बच्चे भी सोशल साइट का इस्तेमाल करते है ऐसे में अगर उन्हें पोर्न जैसी चीजें दिखाई जाए तो जाहिर सी बात है कि उन पर गलत प्रभाव पड़ता है। अगर कभी आप फेसबुक पर दिये गये पोर्न समाचार के कमेंट पढ़ेगें तो आप यह बात अच्छे से समझ जाएंगें कि इस तरह के खबर को पढ़ने में जनता भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती है उल्टा मीडिया को गालियां देती है। इस तरह के खबर से न केवल मीडिया अपने लक्ष्य से भटक रही है बल्कि अपने विश्वास को भी खो रही है। आज अगर आप किसी भी आम जनता से पूछेगें तो वे मीडिया को गाली देकर निकल जाते है।
अपने पैर पर कुल्हाड़ी कैसे मारते है ये बात तो कोई मीडिया से ही सीखे। जिस मीडिया की गुणगान करते हुए लोग थकते नही थे आज उसी मीडिया पर लोग थूक रहे है। इसका बस एक ही कारण है मीडिया का भटक जाना। मीडिया को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आखिर क्यों उसकी छवि धीरे धीरे धूमिल होती जा रही है। इसका एक यह भी कारण हो सकता है कि मीडिया में लोगों की संख्या भरमार हो रही है और इसमें वे लोग भी आ जाते है जिनका मीडिया में दूर दूर तक कोई दिलचस्पी नहीं होती है फिर भी वे पैसे कमाने के लोभ में आ जाते है। परिणामस्वरूप उन्हें मीडिया का क्या लक्ष्य है इस बात से कोई मतलब नहीं होता है।
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