बुधवार, 16 दिसंबर 2015

बुलेट ट्रेन अभिशाप

बुलेट ट्रेन की शुरूआत भारत के आजाद होने के महज 17 साल बाद ही हो चुका था। इसके इतिहास पर अगर गौर करे तो  यह 1964 में जापान में शुरूआत हुई उसके बाद 1981 मे यह फ्रांस में शिरकत कर चुकी । जापान और फ्रांस के बाद इसका चसका चीन को लगा जहाँ इसकी शुरूआत 2007 में हुई। 2014 आते आते इसकी झलक भारत में दिखने लगी जब 16 लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने चुनाव प्रचार के दौरान बुलेट ट्रेन का वादा किया गया। तब से बुलेट ट्रेन मानो ऐसे लोगों की जुबान पर छा गया जैसे इसके सिवा और कुछ उनकी जरूरत का हिस्सा ही नही। 2015 में अपने चुनावी वादों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने जापान के सहयोग से बुलेट ट्रेन के माडल पर साइन किया। हालाकिं इसकी शुरूआत 2024 से होगी। भारत जैसे विकसित देश के लिए जहां उसकी जरूरत रोटी कपड़ा मकान आदि है वहां पर उसे बुलेट ट्रेन जैसी चीजों से अवगत कराया जा रहा है।

            बीबीसी के एक लेख के अनुसार बुले़ट ट्रेन के आने की खुशियां लोग मना रहे वही बुलेट ट्रेन के आने से भारत पर उसकी बुलेट ट्रेन की लागत लगभग 98,805 करोड़ो का कर्जा हो जाएगा। इस कर्ज से भारत इंडोनेशिया से भी बढ़़ा कर्जदार बन सकता है। सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम चुकायेंगे कैसे । ग्राहक मिलना या न मिलना यह तो वक्त बताएगा।

    महाराष्ट्र से अहमदाबाद तक बुलेट ट्रेन चलाने की बात हुई है। अगर महाराष्ट्र से अहमदाबाद तक अगर कोई व्यक्ति विमान से सफर करता है तो उसको 1720 रूपये में मात्र 70 मिनट लगते है दूसरी तरफ बुलेट ट्रेन का अनुमानित किराया 2800 होगा। तो आमतौर पर यह काफी मंहगा साबित होगा। इतिहास गवाह है कि सुविधाए बढ़ने से मंहगाई भी बढ़ती है। ऐसे में जब अभी मंहगाई का बोझ आम जनता नहीं झेल पा रही है तो जब देश में हाई स्पीड वाली रेल चलेगी तो यह बात किसी छुपी नहीं होगी कि मंहगाई सातवें नहीं बल्कि दसवें स्थान पर अपना परचम लहराती हुई दिखेगी। एक प्रचलित कहावत है कि जितनी चद्दर हो उतनी ही पैर फैलाना चाहिए वरना इसका हश्र क्या होता है इसके अंजाम से शायद ही कोई बच पाया होगा। यहाँ पर चद्दर से तात्पर्य है देश की आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था और पैर से तात्पर्य है बुलेट ट्रेन से। यह बात बहुत गंभीर अध्ययन करने पर समझ आएगी।


        अब बात बुलेट ट्रेन के अभिशाप की गांधी जी के स्वराज नामक ग्रंथ में यह बात कही गई है कि हिंदुस्तान अंग्रेजों को भगाना चाहता है परंतु उनकी सभ्यता को अपनाए हुए रखना चाहता है। इस कथन की पुष्टि आज देश में बुलेट ट्रेन नामक जहरीले सर्प से हुई। स्वराज के कथन की व्याख्या करते हुए अगर हम विदेशी चीजों या तकनीकों को अपनाएंगें तो एक सच्चे स्वराज की स्थापना कैसे होगी। जिस देश में लाखों हजारों युवक बेरोजगार है उस देश में इतनी मंहगी सुविधा का क्या काम। जहां भिखारीयों की टोली का सामना करते हुए ही दिन और रात की शुरूआत होती है, जिस देश में हजारों लोग रात को भूखे सो जाते है और जहां पर पैसे न होने के कारण किसी का लड़का,पति,लड़की आदि का ईलाज न होने की वजह से उनकी मौत हो जाती है, इसके अलावा जहां कई सारी समस्याएं हो उनका निदान न करने की बजाए सुख सुविधाओं से जुड़ी चीजों का उपाय करेंगे तो वह उस देश के लिए अभिशाप ही साबित होगा। यह बात अलग है कि एक विकासशील देश के लिए उसमें विकास होना ही उसकी शान होती है परंतु यह कहा तक सही है कि घर फूंक तमाशा देखे। आज हमें बुनियादी विकास की जरूरत है। जिसकी बदौलत हम अपनी नीव को मजबूत कर सके।

      बुलेट ट्रेन समाज में भेदभाव पैदा करने वाली भी साबित होगी। अमीरी- गरीबी का भेदभाव प्राचीन काल से समाज में चली आ रही है इस पर भी बुलेट ट्रेन चार चांद लगा देगी। अमीरों के लिए जहां ये शान शौगत की बात होगी वही गरीबों के लिए गाल पर तमाचा साबित होगी। बेचारा गरीब जहां उसके पास रहने का ठिकाना तक नही है उसकों भला बुलेट ट्रेन से क्या लाभ होगा।

     हमारी सरकार जिसका का उद्देश्य है सबका साथ सबका विकास। बुलेट ट्रेन से भला सबका विकास कैसे संभव हो सकता है। अफसोस की बात है कि देश के प्रधानमंत्री एक तरफ कहते है कि हम सबको साथ लेकर ही देश का विकास करेगें लेकिन दूसरी तरफ भेदभाव की खाई को और बड़ा करने की कसर को नहीं छोड़ा। यह बात हो साफ हो गई कि पूंजीपतियों की सरकार केवल पूंजी देने वाले का ही भला करती हुई दिखाई दे रही है। माननीय सरकार जी पहले देश से गरीबी का निदान करे और जब तक देश में कोई भी भिखारी नहीं बचेगा तभी ही देश का वास्तव में विकास होगा न कि बुलेट ट्रेन आदि से।

        

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