मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

धारावाहिक


            धारावाहिक  मनुष्य के जीवन का अभिन्न का अंग बन गया है। हर घर में धारावाहिक का बोलबाला है। यह मनोरंजन का अहम माध्यम बन चुका है। शाम को सात बजे से रात्रि ग्यारह बजे तक अक्सर हर घर में धारावाहिक चलता हुआ दिखाई देगा। जिस तरह से इंसान खाने के बिना नही रह सकता उसी तरह से धारावाहिक के बिना भी नही रह सकता। हर वर्ग के व्यक्ति इसमें दिलचस्पी रखते है। वैसे धारावाहिक के मामले में महिलाऔं पर व्यंग्य कसा गया है कि उन्हें कुछ मिले या मिले पर धारावाहिक देखने को जरूर मिलना चाहिए। लेकिन ये कुछ हद तक की सही क्योंकि आज पुरूष बच्चे सभी इसमें रूचि रखते है। धारावाहिक में सास बहु की तीखी मीठी तकरारे सबके मन को भाति है। धारावाहिक का किरदार हर दिल को भाता है। अभिनय क्या कमाल के होते है। तीस मिनट का धारावाहिक देखने के लिए लोग दो घंटे बर्बाद कर देते है क्योकि धारावाहिक शुरू होने से पहले और उसके खत्म होने के बाद उसी के बारे मे सोचते रहते है। यही तो धारावाहिक का कमाल है कि वह अपने कला से लोगों को बाधे रखता है। इससे लोग बोर नहीं होते है बल्कि इसकों वे सालों साल तक देखने में आनंद प्राप्त करते है। कुछ धारावाहिक तो ऐसे है जो सालों साल से चले ही रहे जैसे -बालिका वधू, दिया और बाती हम आदि।

रविवार, 20 दिसंबर 2015

ये कैसा इंसाफ !


           आश टूट गयी, भरोसा उठ गया

                और

        आखें भीगी की भीगी रह गयी।

तीन साल की उम्मीद टूटने पर कैसा लगता है कोई जाकर निर्भया के अभिभावक से पूछे। क्या कसूर था उस लड़की का, किस बात की सजा उसे दी गयी। क्या उस लड़की का रात को घर से बाहर निकलना गुनाह था, क्या इसी गुनाह की सजा उसे मिली थी? दिसबंर की वो काली रात शायद ही कोई याद करना चाहेगा जब निर्भया हैवानियत की शिकार हुयी थी। उसे क्या पता था कि वो रात उसकी जिन्दगी को मिटा कर रख देगी। तीन साल पहले दिल्ली में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को हिला दिया था। हैवानियत की शिकार होने के बावजूद देश की इस बहादुर बेटी ने दस दिनों तक गंभीर हालत में अपने इंसाफ के लिए जिन्दगी और मौत से संघर्ष करती रही लेकिन उसके संघर्ष का ये अंजाम होगा ऐसा उसे पता नहीं था।