ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका जताई गई हो। इतिहास के पन्नों पर अगर गौर किया जाये तो 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि उसने ईवीएम से छेड़खानी की। 2009 के चुनाव में तो विरोधी पार्टी यानि बीजेपी के दो दिग्गज नेताओं ने ईवीएम की गड़बड़ी पर बाकायदा पुस्तक लिख डाली थी। पुस्तक का शीर्षक था कि democracy at risk/can we trust our electronic machine? इस पुस्तक में ईवीएम के धोखाधड़ी का खुलासा किया गया है। ईवीएम पर सवाल खड़े करना कहाँ तक उचित है या फिर सीधे-सीधे लोकतंत्र की प्रणाली पर सवाल उठाना कितना सही है? क्या वाकई ईवीएम घोटाला हो सकता है या फिर करारी शिकस्त से विरोधी पार्टियां खिसियानी बिल्ली की तरह बौखला जाती है?
मायावती के आधारहीन आरोपों अगर सही माना भी जाये तो क्या 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने भी ईवीएम से छेड़खानी की थी या फिर जितनी भी पार्टियां चुनाव जीतती है;वो सभी ईवीएम की गड़बड़ी की बदोलत ही राजगद्दी पर सवार होती है? यदि ऐसा है तो फिर तो सतर्क हो जाना चाहिए पुरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को! मायावती के आरोपों में सुर में सुर मिलाने वाले केजरीवाल जी को ये नहीं भूलना चाहिए की दिल्ली में उन्होंने 70 में 67 सीट जीती थी;तो क्या बीजेपी-गठबन्धन यूपी में 403 में से 325 नहीं जीत सकती है! तो क्या दिल्ली में भी ईवीएम खराब थी? साहब अगर यूपी में ईवीएम खराब हो सकती है तो दिल्ली में क्यों नहीं? आरोपों के दूसरे पहलू को देखा जाये तो भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रचलित कहावत 'जहाँ चिंगारी होती है,धुंआ वहीं से उठता है' पर गौर करके उचित कार्रवाई की जानी चाहिए! खैर अगर सवाल उठे है; तो जाँच कराने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए! क्योंकि लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर उठा गये सवालों को बेबुनियाद करने के लिए उसकी जाँच होनी ही चाहिए ताकि फिर कोई लोकतंत्र की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर उसको शर्मिंदा न कर सके! लेकिन यहाँ भी एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि अगर वाकई ईवीएम में गड़बड़ी होती है तो कभी भी कोई सत्ताधारी पार्टी सत्ता से विमुख नहीं होती;क्योंकि ईवीएम की जाँच और पड़ताल सरकार के सामने ही की जाती है और सरकारी कर्मचारी ही पैनल पर बैठते है!
यूपी के चुनावी नतीजा के बाद बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग जमकर की जा रही है। यूपी में चुनाव के बाद ईवीएम पर मचे बवाल की वजह से दिल्ली के मुख्यमंत्री समेत अन्य पार्टियां दिल्ली में नगरनिगम के चुनाव में बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग कर रहे है! विश्व में अमेरिका समेत कई ऐसे देश है जहां वोटिंग प्रक्रिया के लिए बैलेट पेपर अपनाई जाती है। अगर वाकई ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है, तो भारतीय चुनाव आयोग के पास बैलेट पेपर एक विकल्प है! यहां कई सवाल खड़े होते है जैसे कि क्या वाकई ईवीएम की प्रणाली को बंद करके बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जायेगा या फिर मायावती के आधारहीन आरोपो पर कार्रवाई करके ईवीएम को ही बरकार रखा जायेगा ? खैर ये तो वक्त ही बताएगा कि चुनाव आयोग क्या फैसला लेता है!

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