शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

जिम्मेदार कौन?


भारत की लाइफलाइन मानी जाने वाली भारतीय रेलवे में रोजाना तकरीबन लाखों लोग सफर करते है... इसके पीछे का कारण लोगों के मन में सुरक्षा का होना माना जाता है... जिसकी वजह से लोग हजारों किलोमीटर का सफर रेल से करना पसंद करते है... लेकिन आए दिन होने वाले रेल हादसे कहीं-न-कहीं रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करते है...
हाल ही में 22 जनवरी 2017 को आंध्रप्रदेश के विजयनगरम के कुनेरु इलाके के पास दिल दहला देने वाला ट्रेन हादसा हुआ... इस हादसे में हीराखंड एक्सप्रेस के 9 डिब्बे पटरी से उतर गए... दुर्घटना में करीब 39 लोगों के मरने और 100 लोगों के घायल होने की खबर सामने आई...
इस हादसे से कुछ समय पहले 28 दिसंबर 2016 को कानपुर के रूरा स्टेशन के पास ट्रेन हादसा हुआ था... इस हादसे में अजमेर-सियालदह एक्सप्रेस के 15 डब्बे पटरी से उतर गए... जिसमें से दो डिब्बे नहर में गिरने और करीब 50 लोगों के घायल होने की खबर सामने आई...
दुर्घटना का सिलसिला यहीं नहीं थमा... इस हादसे से करीब एक महीने पहले 20 नंवबर 2016 को कानपुर के पास पुखरायां में पटना इंदौर एक्सप्रेस के 14 डिब्बे पटरी से उतर गए... इस हादसे में करीब 150 लोगों से ज्यादा की मौत हो गई और करीब 180 लोग घायल हो गए थे...


इन हादसों पर गौर किया जाए तो ये तीनों हादसे बीते 3 महीनों मे हुए... जिसमें करीब 190 लोगों की मौत हो गई और 280 लोग घायल हो गए... इनमें से दो हादसे तो कानपुर के पास ही हुए... लेकिन एक हादसा होने के बाद भी रेलवे ने अपनी आंखे नहीं खोली... अगर पहले हादसे के बाद ही सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाएं होते तो शायद दूसरे हादसे को रोका जा सकता था....
रेलवे हादसों के इतिहास पर अगर गौर किया जाए तो इसी तरह के तमाम दुःखद हादसें इतिहास के पन्नों पर उल्लेखित है...जहां एक तरफ सरकार रेलवे की सुरक्षा का दावा करती नहीं थकती है, वहीं दूसरी तरफ आए दिन होने वाले हादसें सरकार के तमाम दावों को दरकिनार करते हुए सुरक्षा व्यवस्था को कठघरें में खड़ा करते है....
हर वर्ष रेलवे बजट में सुरक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन रेलवे की व्यवस्था में कोई खास फर्क देखने को नहीं मिलता है... कहीं ये महज “हाथी के दाँत खाने के कुछ, और दिखाने के कुछ और” मुहावरे को तो प्रतीत नहीं करता?
आखिर जिम्मेदार कौन है इन रेल हादसों का? आखिर क्यों आए दिन रेल हादसें हो रहे हैं? क्यों ट्रेन बेकाबू होकर पलट जाती है? आखिर क्यों सरकार मुआवजा देकर मुद्दे को शांत कराने में सफल हो जाती है? इन तमाम सवालों के बीच मुख्य सवाल ये उठता है कि अभी तक कोई कार्रवाई की गई या नहीं? अगर कार्रवाई की गई है तो उसका क्या नतीजा निकला? कार्रवाई में हादसों का क्या कारण सामने आया? इसमें किन लोगों को दोषी पाया गया और उन्हें क्या सज़ा दी गई? इन सभी सवालों के जवाब सरकार को जनता के सामने रखना चाहिए... सरकार के चुप्पी साधने का कारण कहीं न कही यात्रियों को सुरक्षा देने में अपनी असफलताओं को छुपाना तो नहीं है...
अफ़सोस की बात तो यह है कि इन हादसों पर भी सभी राजनीतिक दल अपनी राजनीति करना नहीं छोड़ते है... राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप का घिनोना खेल खेलने से बाज नहीं आती है... वे कुछ दिन तक हादसे पर जोर शोर से सरकार को घेरने की कोशिश करते है और कुछ दिन बाद ही मामला ठंडा होने पर उस पर कोई टिप्पणी नहीं करते है...
सरकार हादसों में मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने के साथ ही भविष्य में हादसें नहीं होने का भरोसा दिलाती है... लेकिन क्या मुआवज़ा देने से ही मृतक के परिजनों को इंसाफ मिल जाता है? क्या सरकार मुआवजा देकर कहीं न कहीं मृतक की जान की कीमत तो नहीं लगाते है? क्या मृतक के परिवार को 5 से 10 लाख रुपये दे देने से वह अपने
सदस्य की कमी को पूरी हो जाती है? सरकार द्वारा दिए गए दिलासे महज़ बर्फ के टुकड़े जैसे ही होते है...जिस तरह से बर्फ का टुकड़ा अपना अस्तित्व खो देता है, ठीक उसी तरह सरकार द्वारा दिलाए गए दिलासों का भी अस्तिव मिट जाता है...
क्या सरकार भविष्य में इन रेल हादसों को रोकने में कामयाब हो पाएगी या नहीं? ये तो खैर वक्त ही बताएगा... लेकिन जिस तरह से रेल हादसे आए दिन बढ़ रहे है उसको लेकर सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए... जिससे कि इन रेल हादसों पर लगाम लगाई

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