लोकतंत्र का महापर्व यानि चुनाव... इस पर्व के दौरान राजनीतिक दलों का भगवान जनता ही होती है... इस पर्व को दो प्रकार विधानसभा और लोकसभा चुनाव के रूप में मनाया जाता है... ये दोनों ही चुनाव 5-5 साल के अंतराल के बाद होते है... हाल ही में भारत के पांच राज्यों में इस पर्व का जश्न मनाया जा रहा है... जिसमें उत्तर प्रदेश, गोवा,मणिपुर, पंजाब और उत्तराखंड शामिल है...
चार
फरवरी से ग्यारह मार्च तक चलने
वाला ये चुनावी मौसम किसी के
लिए खास तो किसी के लिए दुखः
की घड़ी साबित होगा...
खैर
ये तो वक्त ही तय करेगा कि किस
दल के लिए हरियाली और किसके
लिए पतझड़ साबित होगा...
प्रत्येक
दल राजनितिक हर दांव पेंच आजमा
रहे है...
इस
चुनावी दंगल में राजनीतिक
पार्टियां अपने अपने प्रत्यशियों
को जिताने के लिए ऐड़ी चोटी का
जोर लगाती नजर आ रही है....साम
दाम दण्ड भेद को अपनाते हुए
राजनीतिक
पार्टियां जीत का परचम लहराने
के लिए चुनावी मैदान में उतर
चुकी है...
फ़िलहाल
चुनावी बुखार सबसे ज्यादा
उत्तर प्रदेश में चढ़ा हुआ
है...
प्रत्येक
पार्टी भारत के सबसे बड़े राज्य
यानी उत्तर प्रदेश में अपनी
सरकार बनाना चाहती है...
यूपी
में बीजेपी,
सपा-कांग्रेस
और बसपा में काटे की टक्कर
मानी जा रही है...
सत्ताधारी
सपा एक बार फिर से यूपी में
राज करना चाहती है...
तो
वही बसपा अपने इतिहास को दोहराना
चाहती है और बीजेपी यूपी में
जीत के सूनापन को दूर करना
चाहती है...
यूपी
में किस दल के सपने होंगे साकार
या किस दल के सपने कांच की तरह
टूट कर बिखर जायेंगे ये तो 11
मार्च
2017
को
ही पता चलेगा...
यूपी
में सरकार बनाने के लिए नेताओं
के बोल भी बेलगाम हो चुके है...
सभी
दल के नेता एक-दूसरे
पर आरोप प्रत्यारोप लगाने
में लगे है...
इस
दौरान वह गलत शब्दों का इस्तेमाल
करने से भी नहीं चूकते...
खैर
ये कोई नई बात नहीं है...
लगभग
हर चुनाव में नेताओं के बोल
बेलगाम हो ही जाते है...
नेताओ
के बीच जुबानी जंग ट्वीटर पर
ट्वीट करने जैसे तेज हो गई
है...
लोकतंत्र
के इस महापर्व में चुनावी
प्रचार-प्रसार
को देखकर ऐसा नहीं लग रहा है
कि ये सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी
पार्टी के लिए जनता से वोट
करने की अपील की जगह एक-दूसरे
पर जुबानी बाण चलाने के लिए
मैदान में उतरे है...
यूपी
में हमेशा से ही जात-पात
की राजनीती होती रही है...
हर
दल का लगभग एक अपना सामुदायिक
वोट बैंक है...
लेकिन
सवाल ये है कि क्या इस बार यूपी
में जात-पात
की परपरागत राजनीती को दरकिनार
करते हुए सरकार चुनी जायेगी...
इसका
जवाब शीशे की तरह साफ़ है कि
नहीं...
क्योंकि
जिस तरह से चुनाव का प्रचार-प्रसार
हो रहा है...
उससे
यही नजर आ रहा है कि अभी वक्त
है यूपी को परम्परागत राजनीती
से मुक्त होने के लिए...
परम्परागत
राजनीतिकरण का शिकार
भारत
के कुछ अन्य राज्य भी
इस
कतार में यूपी के साथ कंधे से
कंधा मिलाकर चल रहे है...
अनेकता
में एकता की अवधारणा ही भारत
की पहचान है...
लेकिन
आज शर्म की बात है कि आजादी के
इतने सालों बाद भी धर्म के नाम
पर जमकर राजनीति की जाती है...
इसका
सबसे बड़ा उदारहण हाल ही में
हो रहे चुनावों में देखने को
मिलता है...
बीजेपी
हिन्दुओं को राम मंदिर का
लालच,
सपा-कांग्रेस
का गठबंधन मुस्लिम समुदाय को
सरंक्षण देने का लालच और बसपा
दलितों के उत्थान को लेकर वोट
मांगते है...
आखिर
कोई दल धर्म की राजनीती से खुद
को अलग-थलग
क्यों नहीं रख पा रहा है...
क्यों
हर चुनाव में पार्टियां अपनी
एक विशेष वोट बैंक को लेकर
प्रचार-प्रसार
करती है...
क्या
सभी धर्म,
जाति
और समुदाय के लोगों को ध्यान
में रखकर प्रचार-प्रसार
नहीं किया जा सकता है?
नेताओं
ने सिर्फ अपने फायदे के लिए
जनता को बलि का बकरा बना दिया
है...आखिर
क्यो और कब तक जनता नेताओं के
इस वार को सहेगी...
मौसम
का मिज़ाज कुछ ऐसा हो गया है कि
चुनावी गाड़ी मैदान से बाथरूम
में जा पहुँची है...
यूपी
में बीजेपी के स्टार प्रचारकों
में से एक पीएम मोदी का
आक्रमकतापूर्ण
रवैया
जनता को लुभा रहा है...
या
अखिलेश-राहुल
का शांत स्वभाव जनता के दिलों
में राज कर रहा है...
या
फिर जनता की नजर में मायावती
है...
इस
सवाल का जवाब तो सिर्फ जनता
के पास ही है...
सभी
पार्टियों ने चुनाव जीतने के
लिए लोक-लुभावने
वाले तमाम वादे किये है...
हर
चुनाव में जनता के सामने
बड़े-बड़े
वादे किए जाते है...
लेकिन
जीतने के बाद सरकार उन वादों
में से एक भी वादें को पूरा
करने की बजाय अपनी जेब भरने
में लग जाते है...
अब
चुनाव के परिणाम आने पर ही पता
चलेगा कि किसके वादों ने जनता
का दिल जीता और किसके वादे
जनता को रास नहीं आए...

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